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बेवजह की याचिकाओं से कोर्ट पर बढ़ता है बोझ, हम जुर्माना लगाएंगे; किस PIL से CJI हुए नाराज

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब वह पहले से ही राजधानी में सेवाओं पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार द्वारा पारित कानून के खिलाफ याचिका पर विचार कर रही है तो फिर नई याचिका पर विचार करने का क्या औचित्य है।

बेवजह की याचिकाओं से कोर्ट पर बढ़ता है बोझ, हम जुर्माना लगाएंगे; किस PIL से CJI हुए नाराज
Sneha Baluniहिन्दुस्तान,नई दिल्लीTue, 12 Sep 2023 05:58 AM
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि जब वह पहले से ही राजधानी में सेवाओं पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार द्वारा पारित कानून के खिलाफ याचिका पर विचार कर रही है तो फिर नई याचिका पर विचार करने का क्या औचित्य है। शीर्ष अदालत ने हाल ही में संसद द्वारा पारित कानून जीएनसीटीडी संशोधन अधिनियम-2023 को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए यह टिप्पणी की है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा, 'आप यहां क्यों आए हैं... दिल्ली सरकार ने पहले ही इसे चुनौती दे रखी है।'

चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि दिल्ली सरकार पहले ही इस कानून को चुनौती दे चुकी है। अब इस मसले पर किसी नई जनहित याचिका की कोई जरूरत नहीं है। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह उस जुर्माना लगाने पर विचार कर सकती है। इसके बाद याचिकाकर्ता व पेशे से अधिवक्ता मुकेश कुमार ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। कोर्ट ने कहा कि  आपको पता भी है कि बेवजह याचिका से संसाधनों पर कितना बोझ पड़ता है।

केंद्र सरकार ने दिल्ली में सेवाओं पर नियंत्रण यानी राजधानी में अधिकारियों के स्थानांतरण-तैनाती के अधिकार को लेकर हाल ही में जीएनसीटीडी संशोधन अधिनियम 2023 को पारित कर लागू किया। पहले दिल्ली सरकार ने केंद्र द्वारा पारित अध्यादेश को चुनौती दी थी। हालांकि, नया कानून पारित होने के बाद दिल्ली सरकार ने याचिका को संशोधित करने और नए कानून को चुनौती देने की अनुमति मांगी थी। जिसकी कोर्ट ने 25 अगस्त को परमिशन दे दी थी।

अध्यादेश के स्थान पर एक कानून पारित किये जाने के कारण याचिका में संशोधन आवश्यक हो गया था। संसद में तीखी बहस और विपक्षी दलों द्वारा इसे पारित होने से रोकने के प्रयास के बावजूद लोकसभा एवं राज्यसभा ने हाल में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक 2023 को मंजूरी दे दी, जिसे दिल्ली सेवा विधेयक के रूप में भी जाना जाता है। इससे राष्ट्रीय राजधानी में नौकरशाहों की तैनाती और स्थानांतरण सहित विभिन्न सेवाओं पर उपराज्यपाल का सर्वोच्च अधिकार होगा।

इससे पहले, शीर्ष अदालत ने केंद्र के 19 मई के अध्यादेश को चुनौती देने वाली दिल्ली सरकार की याचिका को पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेज दिया था। अध्यादेश के जरिये केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी में सेवाओं से स्थानीय सरकार का नियंत्रण छीन लिया था और एक बार फिर से केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच नये सिरे से विवाद शुरू हो गया था। आम आदमी पार्टी (आप) सरकार ने अध्यादेश को सेवाओं पर नियंत्रण को लेकर उच्चतम न्यायालय के फैसले के साथ 'धोखा' करार दिया था।

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