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Hindi News NCR6 साल बाद घर में गूंजी किलकारी, एक दिन बाद ही मातम में बदली; दिल्ली के बेबी केयर सेंटर अग्निकांड ने बुझाए कई घरों के चिराग

6 साल बाद घर में गूंजी किलकारी, एक दिन बाद ही मातम में बदली; दिल्ली के बेबी केयर सेंटर अग्निकांड ने बुझाए कई घरों के चिराग

दिल्ली के दिल्ली विवेक विहार स्थित बेबी केयर सेंटर अस्पताल में लगी आग ने जहां एक साथ कई घरों के चिराग बुझा दिए हैं। वहीं हादसे के बाद अस्पताल की खामियों को भी उजागर कर दिया है। 

6 साल बाद घर में गूंजी किलकारी, एक दिन बाद ही मातम में बदली; दिल्ली के बेबी केयर सेंटर अग्निकांड ने बुझाए कई घरों के चिराग
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Praveen Sharmaनई दिल्ली। हिन्दुस्तानMon, 27 May 2024 07:32 AM
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दिल्ली के दिल्ली विवेक विहार स्थित बेबी केयर सेंटर अस्पताल में लगी आग ने जहां एक साथ कई घरों के चिराग बुझा दिए हैं। वहीं हादसे के बाद अस्पताल की खामियों को भी उजागर कर दिया है। असमय अपने जिगर के टुकड़ों  को खोने वाले मां-बाप और परिवार अब अपने आपको ही कोस रहे हैं।

छह साल बाद घर में गूंजी थी किलकारी

पूर्वी दिल्ली के ज्वाला नगर निवासी विनोद की पत्नी ज्योति ने शनिवार सुबह बेटे को जन्म दिया था। जन्म के बाद से बेटे को सांस लेने में तकलीफ थी। परिवार ने उसे शनिवार सुबह 11:30 बजे बेबी केयर सेंटर अस्पताल में भर्ती कराया था। परिजनों ने बताया कि छह साल बाद घर में बच्चे की किलकारी गूंजी थी, लेकिन यह खुशी एक दिन बाद ही मातम में बदल गई। परिजनों ने बताया कि आग लगने की जानकारी उन्हें रविवार सुबह टीवी देखने से मिली।

मौत के मंजर ने मातम में बदल दी घर की खुशियां

बागपत के गांव गढ़ी कलंजरी के रहने वाले 28 वर्षीय पवन यूपी पुलिस में कॉन्स्टेबल हैं। फिलहाल, वह फिरोजाबाद में तैनात हैं। पत्नी भारती ने छह दिन पहले बेटी को बेटी को जन्म दिया था। डॉक्टरों ने बताया कि बच्ची को सांस लेने में दिक्कत महसूस हो रही है। इसकी वजह से उसे विवेक विहार स्थित बेबी केयर सेंटर में भर्ती कराया गया था। अभी पवन और भारती बेटी को ठीक से गोद में खिला भी नहीं पाए थे कि हादसे ने उसकी जान ले ली। 

छुट्टी मिलने से पहले ही हादसा हो गया 

वहीं, गाजियाबाद के राधा कुंज बुद्ध विहार में रहने वाले 30 वर्षीय राजकुमार की पत्नी उमा ने 7 दिन पहले बेटी को जन्म दिया था। बुखार और सीने में इंफेक्शन की वजह से उसे गाजियाबाद से दिल्ली के बेबी केयर सेंटर में रेफर कर दिया गया था। परिजनों ने बताया कि सात दिन से भर्ती उनकी बच्ची अब ठीक हो गई थी। डॉक्टरों ने उसे रविवार को डिस्चार्ज करने के लिए कहा था। रविवार को उसे लेने आने से पहले ही उन्हें अस्पताल में आग की खबर मिल गई। वह दौड़कर दिल्ली पहुंचे तो पता चला कि उनकी बेटी की मौत हो गई है।

सुबह पोते का शव लेने जाने से पहले ही हो गया हादसा

वहीं, गाजियाबाद के गांव जावली निवासी नवीन और कुसुम के यहां गुरुवार को बेटे ने जन्म लिया था। नवजात को सांस लेने में दिक्कत होने पर उसे भी इसी अस्पताल में भर्ती कराया था। आग लगने पहले ही शनिवार रात 10:30 बजे बच्चे की बीमारी से मौत हो गई। बच्चे के दादा सेवाराम ने बताया कि रात होने की वजह से बच्चे का शव घर लेकर नहीं गए। बच्चे का शव रात को घर में रखना पड़ता और रविवार सुबह उसका अंतिम संस्कार किया जाता। रातभर परिवार में गमगीन माहौल रहता, इसकी वजह से उन्होंने बच्चे की मां और परिवार के अन्य सदस्यों से उसकी मौत की खबर छुपाए रखी। रविवार को उन्हें शव लेकर घर पहुंचना था, इससे पहले देर रात 11:30 बजे हादसे में नवजात का शव भी झुलस गया।

किस्मत खराब थी जो हम यहां आए...

दिल्ली के भजनपुरा निवासी वसीह आलम और सितारा खातून ने भी अपने नवजात को इस अग्निकांड में खो दिया। मृतक नवजात की मौसी ने बताया कि हमारी किस्मत खराब थी कि जो हम यहां आ गए। बहन के नवजात बेटे को सांस लेने में दिक्कत थी, उसे अस्पताल से यहां रेफर कर किया गया था। इलाज पर हर दिन 16 हजार रुपये का खर्च आ रहा था। एक या दो दिन में बच्चे को अस्पताल से छुट्टी मिलने वाली थी। उन्होंने बताया कि बहन भजनपुरा में रहती हैं। उन्होंने कहा कि जब आग लगी तो अस्पताल के नर्स और डॉक्टर और सिक्योरिटी वाले कहां थे। उन्होंने कहा कि हम बच्चे को यहां नहीं लाने वाले थे, क्योंकि यह हमारे लिए बहुत महंगा पड़ रहा था। हमारी किस्मत खराब थी कि जो हम यहां आ गए।

व्यवस्था ठीक होती तो न जाती जान

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के गुलावठी क्षेत्र के गांव अलीपुर निवासी रॉबिन चौधरी ने बताया कि उनके भाई ऋतिक चौधरी के घर 17 मई को बेटे का जन्म हुआ था। तबीयत खराब होने पर वे गुलावठी से बुलंदशहर के एक निजी नर्सिंग होम ले गए। वहां आईसीयू की व्यवस्था न होने की वजह से बच्चों को मेरठ के एक अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद बच्चे को मेरठ से दिल्ली के विवेक विहार स्थित इस अस्पताल में लाया गया। उन्होंने कहा कि यहां व्यवस्था ठीक होती तो बच्चे की जान नहीं जाती।

‘रुकने देते तो अपनों को बचा लेते’

अपने जिगर के टुकड़े को खोने वाले माता-पिता ने अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ आक्रोश था। परिजनों का कहना है कि अस्पताल प्रबंधन रोजाना सिर्फ 15 से 20 मिनट ही बच्चों से मिलने देता था। परिवार के किसी भी सदस्य को अस्पताल में रुकने की इजाजत नहीं थी। परिजन अस्पताल में होते तो आग लगने के वक्त मदद कर अपने जिगर के टुकड़ों को बचा लेते। परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर कठोर कार्रवाई की मांग की है।

जीटीबी अस्पताल की मोर्चरी में रोते-बिलखते पहुंचे परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि यह बेबी केयर सेंटर बेहद छोटे करीब 150 गज के प्लॉट पर बनाया गया था। सीढ़ियां और गलियारा बेहद संकरा था। आग बुझाने के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। चार-पांच दिन के बच्चे असहाय थे और उन्हें पता भी नहीं था कि इस दुर्घटना में उनकी जान कैसे बच सकती है। अस्पताल प्रबंधन को ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए पहले से इंतजाम रखने चाहिए थे।