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Hindi News NCRजन्म देना होगा; 20 साल की कुंवारी लड़की को SC ने क्यों नहीं दी कोख में खत्म करने की इजाजत

जन्म देना होगा; 20 साल की कुंवारी लड़की को SC ने क्यों नहीं दी कोख में खत्म करने की इजाजत

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत 24 हफ्ते से ज्यादा के गर्भ को गिराने की अनुमति तभी दी जा सकती है जब मेडिकल बोर्ड द्वारा भ्रूण में पर्याप्त असामान्यता के बारे में बताया गया हो।

जन्म देना होगा; 20 साल की कुंवारी लड़की को SC ने क्यों नहीं दी कोख में खत्म करने की इजाजत
Sourabh JainPTI,नई दिल्लीWed, 15 May 2024 04:15 PM
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 20 साल की अविवाहित महिला की उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें उसने  27 हफ्तों के अपने गर्भ को हटाने की अनुमति मांगी थी। इस दौरान कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि गर्भ में पल रहे भ्रूण को भी जीवित रहने का मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने महिला के वकील की उस दलील को भी नहीं माना जिसमें उसने कहा कि फिलहाल भ्रूण गर्भ में है और जब तक बच्चा पैदा नहीं हो जाता, उसे रखना या नहीं रखना मां का अधिकार है।

जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। इस याचिका में महिला ने दिल्ली हाई कोर्ट के 3 मई के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें HC ने महिला को गर्भपात कराने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। फैसला देने वाली पीठ के दो अन्य जज जस्टिस एसवीएन भट्टी और संदीप मेहता थे। 

वकील ने कहा- कानून सिर्फ मां की बात करता है

बेंच ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, 'हम कानून के विपरीत कोई भी आदेश पारित नहीं कर सकते। गर्भ में जी रहे बच्चे को भी जीने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। आप इस बारे में क्या कहते हैं?'

जवाब में महिला के वकील ने कहा, 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट केवल मां के बारे में बात करता है। यह मां के लिए बना है।'

कोर्ट बोला- प्रेग्नेंसी 7 महीने से ज्यादा की हो चुकी है

बेंच ने आगे पूछा, 'गर्भावस्था की अवधि अब सात महीने से ज्यादा हो चुकी है और बच्चे के जीवित रहने के अधिकार का क्या? आप इसे कैसे देखते हैं?'

महिला के वकील ने कहा कि भ्रूण गर्भ में है और जब तक बच्चा पैदा नहीं हो जाता, यह मां का अधिकार है। आगे उन्होंने कहा, 'याचिकाकर्ता इस समय गंभीर दर्द वाली स्थिति में है। यहां तक कि वह बाहर भी नहीं आ सकती। वह NEET परीक्षा की तैयारी के लिए क्लासेस ले रही है। वह अत्यधिक दर्द वाली स्थिति में है और इस स्तर पर वह समाज का सामना भी नहीं कर सकती।'

तीन जजों की बेंच ने कहा- सॉरी

वकील ने अदालत से कहा कि महिला की मानसिक और शारीरिक स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। हालांकि बेंच ने जवाब में सॉरी कहा। 

हाई कोर्ट ने कहा था- भ्रूण पूरी तरह ठीक

इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने तीन मई को दिए अपने आदेश में बताया कि 25 अप्रैल को अदालत ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया था ताकि भ्रूण और याचिकाकर्ता की स्थिति का आकलन किया जा सके। हाई कोर्ट ने कहा, 'रिपोर्ट (मेडिकल बोर्ड की) देखने से पता चलता है कि भ्रूण में कोई जन्मजात असामान्यता नहीं है और न ही मां को गर्भावस्था जारी रखने से कोई खतरा है, जिसके लिए भ्रूण को समाप्त करना अनिवार्य हो।'

आगे कोर्ट ने बताया, 'चूंकि भ्रूण व्यवहार्य और सामान्य है, और याचिकाकर्ता को गर्भावस्था जारी रखने में कोई खतरा नहीं है, इसलिए भ्रूणहत्या न तो नैतिक होगी और न ही कानूनी रूप से स्वीकार्य होगी।'

महिला को 27 हफ्तों बाद गर्भ का पता चला

याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट को बताया कि था कि 16 अप्रैल को उसे पेट में दर्द हुआ था और जब अल्ट्रासाउंट कराया गया तो 27 सप्ताह का गर्भ होने की जानकारी मिली जो गर्भपात कराने के लिए कानूनी रूप से तय अधिकतम समयसीमा 24 सप्ताह से अधिक थी।

बता दें कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत 24 सप्ताह से ज्यादा की अवधि की गर्भावस्था को गिराने की अनुमति तभी दी जा सकती है जब मेडिकल बोर्ड द्वारा भ्रूण में पर्याप्त असामान्यता पाई गई हो या गर्भवती महिला के जीवन को बचाने के उद्देश्य से एक राय बनाई गई हो।