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Kisan Andolan 2.0: किसानों का दिल्ली कूच आज, अन्नदाताओं की क्या हैं डिमांड; क्या है आंदोलन की रणनीति

Kisan Andolan: पंजाब, हरियाणा और यूपी के अलावा कई और राज्यों के किसानों ने दिल्ली कूच की तैयारी कर ली है। इसे 'दिल्ली चलो मार्च' का नाम दिया गया है। इसके जरिए दिल्ली की घेराबंदी की जाएगी।

Kisan Andolan 2.0: किसानों का दिल्ली कूच आज, अन्नदाताओं की क्या हैं डिमांड; क्या है आंदोलन की रणनीति
Sneha Baluniलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीTue, 13 Feb 2024 01:50 PM
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Kisan Andolan: किसानों ने एक बार फिर दिल्ली कूच करने की तैयारी कर ली है। पंजाब, हरियाणा और यूपी के अलावा कई और राज्यों के किसान 13 फरवरी को दिल्ली कूच की तैयारी में हैं। करीब दो साल पहले तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों ने दिल्ली की घेराबंदी की थी। इसे 'दिल्ली चलो मार्च' का नाम दिया गया है। माना जा रहा है कि इसके जरिए दिल्ली की एक बार फिर घेराबंदी की जाएगी। ऐसे में हरियाणा के साथ-साथ दिल्ली पुलिस ने भी किसानों को राष्ट्रीय राजधानी में प्रवेश करने से रोकने के लिए बड़े पैमाने पर सुरक्षा व्यवस्था की है। इसके लिए पंजाब और हरियाणा एवं हरियाणा और दिल्ली के बीच की सीमाओं को सील कर दिया है। पिछली बार के विपरीत इस बार किसान केंद्र सरकार से कई उपायों की मांग कर रहे हैं, जो खेती की वित्तीय व्यवहार्यता के लिए आवश्यक हैं।।

आंदोलन के कौन-कौन हैं चेहरे

पहले के विरोध प्रदर्शनों में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लगभग सभी किसान संगठन, जिनकी संख्या 40 से अधिक थी, संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के तहत साथ आए थे। इस बार उस संगठन का एक टूटा हुआ गुट विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहा है। संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) ने प्रमुख किसान नेताओं को बाहर कर दिया है, जो पिछली बार सुर्खियों में आए थे, जैसे दर्शन पाल, जोगिंदर सिंह उगराहां, राकेश टिकैत, बलबीर सिंह राजेवाल और गुरनाम सिंह चारुनी।

एसकेएम (गैर-राजनीतिक) में जगजीत सिंह दल्लेवाल के नेतृत्व वाला बीकेयू (दल्लेवाल) और सरवन सिंह पंढेर के नेतृत्व वाला किसान मजदूर मोर्चा शामिल है। जो 17 कृषि संगठनों के समर्थन का दावा करते हैं। 13 फरवरी के दिल्ली चलो मार्च से पहले पंजाब से पंढेर और दल्लेवाल और हरियाणा से अभिमन्यु कोहर एसकेएम (गैर-राजनीतिक) के सबसे प्रमुख चेहरे रहे हैं। वहीं पिछले विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने वाले बड़े किसान नेता वेट एंड वॉच मोड में हैं। राकेश टिकैत जैसे कुछ लोगों ने 16 फरवरी को भारत बंद के आह्वान का समर्थन किया है।

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एसकेएम नेताओं का सतर्क रुख, जिन्होंने इस बार पीछे रहने का फैसला किया है, किसान संगठनों के अंदर गहरी गुटबाजी का संकेत देता है। इस बार जाट समुदाय के संगठन खाप ने थोड़ा उत्साह दिखाया है, जिन्होंने पहले विरोध प्रदर्शनों के दौरान बड़े पैमाने पर लामबंदी की थी। हालांकि पिछली बार मुख्य रूप से पंजाब के किसानों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया था और दिल्ली की सीमाओं पर पहुंच गए थे। इसके बाद दिल्ली खाप हरकत में आई थीं।

प्रदर्शनकारी किसानों की क्या हैं मांगें

इस बार किसानों की मुख्य मांग सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी है। सरकार कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिशों के आधार पर साल में दो बार लगभग दो दर्जन वस्तुओं के लिए एमएसपी निर्धारित करती है। एमएसपी के तहत अधिकांश फसल खरीद पंजाब और हरियाणा से होती है। यहां मुख्य रूप से गेहूं और चावल की उपज होती है जो सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सपोर्ट करती है। किसान ऐसा कानून चाहते हैं जो हर फसल पर एमएसपी की गारंटी दे। हालांकि, कानूनी गारंटी की मांग को लेकर सरकार की कई चिंताएं हैं जैसे वैश्विक कीमत, खरीद के लिए सरकार पर दबाव, निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता और केंद्रीय व्यय।

दूसरी प्रमुख मांग कृषि पर एमएस स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को पूर्ण रूप से लागू करना है। हरित क्रांति के जनक कहे जाने वाले कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन को हाल ही में भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। समिति की मुख्य सिफारिशों में से एक एमएसपी को उत्पादन की एवरेज औसत लागत से कम से कम 50 प्रतिशत ऊपर बढ़ाना था। इसके अलावा गन्ने की बेहतर कीमतें, 60 साल से अधिक उम्र के प्रत्येक किसान को हर महीने 10,000 रुपए की पेंशन, लखीमपुर खीरी हिंसा पीड़ितों के लिए न्याय की मांग और पिछले किसान प्रदर्शन के दौरान 'शहीद' हुए किसानों के स्मारक के लिए दिल्ली में जमीन देना शामिल है।

तीन प्रमुख सीमाओं पर सख्ती 

टिकरी बॉर्डर पर सीसीटीवी कैमरे लगाने के साथ ही ड्रोन से आसपास के इलाकों पर नजर रखी जा रही है। वहीं, सिंघु बॉर्डर पर 50 मीटर तक लोहे-कंक्रीट के बेरिकेड, लोहे के बड़े-बड़े कंटेनर और डंपर खड़े किए गए हैं गाजीपुर बॉर्डर पर सर्विस लेन को सोमवार रात ही बंद कर दिया गया। चिल्ला बॉर्डर पर भी पुलिस तैनात है।

क्या है रणनीति

इस बार किसान प्रदर्शन में भीड़ कम है। 25,000 किसानों और 5,000 ट्रैक्टरों के मार्च में हिस्सा लेने की संभावना है। हालांकि यह शुरुआती चरण हो सकता है और विरोध प्रदर्शन बढ़ने और किसानों के दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचने पर ज्यादा किसान और अन्य किसान संगठन इसमें शामिल हो सकते हैं। सरकार किसानों को दिल्ली मार्च से रोकने के लिए तुरंत उनसे बातचीत करने में जुट गई है। किसानों और केंद्र सरकार के बीच सोमवार को चंडीगढ़ में आधी रात तक चली बैठक बेनतीजा रही। बैठक के बाद किसान नेताओं ने कहा कि उनका दिल्ली कूच जारी रहेगा। कथित तौर पर, दो खापों ने किसानों से अपील की है कि वे दिल्ली की घेराबंदी करने की बजाय सरकार से बात करें।

सोनीपत में एक खाप नेता ने पहले के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हरियाणा के सीमावर्ती जिलों के लोगों को बड़े पैमाने पर नुकसान और असुविधा का सामना करने की बात कही, जिसके कारण बड़ी संख्या में व्यवसाय और उद्योग बंद हो गए। इन कारणों से संकेत मिलता है कि इस बार किसानों का विरोध प्रदर्शन फीका रह सकता है। किसानों की कम भागीदारी, कुछ ही महीनों में फसल कटने का टाइम आने और लोकसभा चुनावों को देखते हुए इस बार आंदोलन लंबे समय तक नहीं चल पाएगा और उम्मीद है कि किसानों को वापस लौटना पड़ सकता है।