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दिल्ली अस्पताल हादसाः पांच साल पहले एक बेटे को खोया था, आज नवजात बेटे को; पीड़ित पिता की व्यथा सुन रो उठेगा मन

दिल्ली के शिशु अस्पताल में लगी आग में मरने वाले बच्चों में से कई की अभी तक पहचान नहीं हो सकी है। अपने जिगर के टुकड़ों की तलाश में भटक रहे पीड़ित परिजनों की व्यथा मन को झकझोर रही है।

दिल्ली अस्पताल हादसाः पांच साल पहले एक बेटे को खोया था, आज नवजात बेटे को; पीड़ित पिता की व्यथा सुन रो उठेगा मन
Subodh Mishraपीटीआई,नई दिल्लीSun, 26 May 2024 09:27 PM
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दिल्ली के शिशु अस्पताल में लगी आग में मरने वाले बच्चों में से कई की अभी तक पहचान नहीं हो सकी है। अपने जिगर के टुकड़ों की तलाश में लगे पीड़ित लोगों की कहानी मन को झकझोर दे रही है। एक पिता ने कहा कि अल्लाह को प्यारी हो गई मेरी बेटी। उन्होंने 11 दिन की बेटी को  यहां भर्ती कराया था, जिसकी अस्पताल में लगी भीषण आग में मौत हो गई। अभी भी छह में से तीन परिवार अपने बच्चे की पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

17 दिन की बच्ची रूही को दो दिन पहले बुखार के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जिसकी आग लगने से मौत हो गई। रूही की मां ने कहा, "कल मैं अपनी बच्ची से मिली और आज सुबह हमें आग लगने की जानकारी मिली। तब से हम उसके बारे में पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "हमने उसके स्वास्थ्य में सुधार के लिए उसे इस अस्पताल में भर्ती कराया,  लेकिन हमें नहीं पता था कि यह अस्पताल हमारे इकलौती बच्ची को छीन लेगा। उन्होंने बताया कि अस्पताल वालों ने उसकी 'नजर की माला' भी उतार दिए। जब वे उसे अंदर ले गए तो उसने सिर्फ डायपर पहना हुआ था। रूही का जन्म 10 मई को हुआ था।

एक पिता ने कहा, "अल्लाह को प्यारी हो गई मेरी बेटी।" उनकी 11 दिन की बेटी की अभी तक पहचान नहीं हुई है। उन्होंने बताया, "मेरी बेटी का जन्म 15 मई को दूसरे अस्पताल में हुआ था। उन्होंने हमसे उसे निगरानी के लिए 72 घंटे तक चाइल्ड केयर अस्पताल में रखने के लिए कहा। उसके बाद हमने उसे चाइल्ड केयर अस्पताल में भर्ती कराया, जहां वह पिछले 10 दिनों से थी। उन्होंने कहा, "मेरे दोस्तों ने फोन किया और मुझे बताया कि दिल्ली के चाइल्ड केयर अस्पताल में जहां मेरी बेटी थी, वहां आग लग गई है। जब मैं यहां आया तो मुझे पता चला कि मेरी बेटी की मौत हो गई है।

एक मजदूर पिता ने बताया कि पांच साल पहले एक बेटे को खो दिया था और आज मैंने अपना नवजात बेटा खो दिया है। आप उन माता-पिता से पूछ सकते हैं जिन्होंने अपने बच्चों के इलाज के लिए अपने गहने बेचे हैं या ब्याज पर पैसे लिए हैं। मैं एक मजदूर हूं और जब पता चला कि मंगलम अस्पताल में पैदा हुए बच्चे को संक्रमण है तो हमने उसे इस अस्पताल में भर्ती कराया। मेरी तीन साल की बेटी है और करीब पांच साल पहले मैंने एक बेटे को खो दिया था। 

एक अन्य अग्नि पीड़ित के रिश्तेदार परविंदर कुमार ने कहा, "हमने अभी तक मां को भी सूचित नहीं किया है।"  यह मेरे रिश्तेदार पवन कुमार का पहला बच्चा था। लड़की का जन्म लगभग छह दिन पहले गाजियाबाद के एक अस्पताल में हुआ था और उसे उसी दिन यहां भर्ती कराया गया था। जब वह पैदा हुई थी तब उसे सांस लेने में समस्या हो रही थी। हमारे रिश्तेदार ने हमें सुबह करीब 9 बजे फोन कर घटना की जानकारी दी। अपने नवजात बेटे को खोने वाले रितिक चौधरी ने कहा कि अस्पताल का दौरा करने वाला हर एक अधिकारी चुप्पी साधे हुए है। क्या अस्पताल वैध था, क्या अस्पताल के पास अग्निशमन विभाग से एनओसी थी, इसका उनके पास कोई जवाब नहीं है।