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शिबू सोरेन को झटका, दिल्ली हाईकोर्ट का लोकपाल कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार

दिल्ली हाईकोर्ट ने भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की शिकायत के आधार पर लोकपाल की ओर से झारखंड मुक्ति मोर्चा प्रमुख delhi high court refuके खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।

शिबू सोरेन को झटका, दिल्ली हाईकोर्ट का लोकपाल कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार
Krishna Singhपीटीआई,नई दिल्लीMon, 22 Jan 2024 06:15 PM
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दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने सोमवार को लोकपाल द्वारा झारखंड मुक्ति मोर्चा प्रमुख शिबू सोरेन के खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि लोकपाल की कार्यवाही के साथ शिकायत को चुनौती देने वाली झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री की याचिका 'प्रीमैच्यौर' थी। अदालत ने शिबू सोरेन की याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा- यह समय से पूर्व है। खबर लिखे जाने तक फैसले की कॉपी नहीं मिल पाई थी। 

बता दें कि भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की शिकायत पर सोरेन के खिलाफ लोकपाल की कार्यवाही शुरू हुई है। अगस्त 2020 में की गई शिकायत में, झारखंड की गोड्डा सीट से भाजपा के लोकसभा सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया कि शिबू सोरेन और उनके परिवार के सदस्यों ने सरकारी खजाने का दुरुपयोग करके भारी संपत्ति अर्जित की और घोर भ्रष्टाचार में लिप्त रहे। 12 सितंबर, 2022 को हाईकोर्ट ने लोकपाल कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। अदालत ने तब कहा था कि मामले पर विचार की जरूरत है।

लोकपाल कार्यवाही पर हमला बोलेते हुए हेमंत सोरेन ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि उनके खिलाफ मामला पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण और राजनीति से प्रेरित है। सोरेन की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि शिकायत पर भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल विचार नहीं कर सकता था क्योंकि आरोप शिकायत प्रस्तुत करने की तारीख से सात साल पहले के समय से संबंधित हैं। लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 53 के तहत प्रावधानों के अनुसार, शिकायत में अपराध की तारीख से सात साल बाद शिकायत नहीं की जा सकती है। 

हालांकि जवाब में लोकपाल का कहना था कि कार्यवाही कानून के अनुसार की जा रही है। शिकायत अभी भी निर्णय के लिए खुली है और वह इस स्तर पर शिकायत की योग्यता पर टिप्पणी नहीं कर सकता है। याचिका में कहा गया है कि लोकपाल की स्थापना शून्य भ्रष्टाचार की नीति के प्रति देश की प्रतिबद्धता के अनुरूप सार्वजनिक पदाधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए की गई थी। ऐसे में एक शिकायत को समय सीमा के आधार पर खारिज करने की आवश्यकता नहीं है।

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