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182 साल की सजा काट रहा बिल्डर की पैरोल बढ़ाने से इनकार, जानें क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि वह पहले ही 7 साल हिरासत में काट चुका है, तीस हजारी स्थित जिला उपभोक्ता फोरम ने 2011 के निष्पादन मामले में कुल 182 साल जेल की सजा सुनाई थी।

182 साल की सजा काट रहा बिल्डर की पैरोल बढ़ाने से इनकार, जानें क्या है पूरा मामला?
Swati Kumariहिन्दुस्तान,नई दिल्लीThu, 15 Feb 2024 06:24 PM
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दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में भ्रष्टाचार के एक मामले में 182 साल की जेल की सजा काट रहे एक दोषी के लिए पैरोल बढ़ाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। यह मामला घर खरीदारों की 344 शिकायतों से संबंधित है, जिन्होंने भूखंडों की खरीद के लिए 90 लाख रुपये से अधिक जमा किए थे। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि वह पहले ही 7 साल हिरासत में काट चुका है, तीस हजारी स्थित जिला उपभोक्ता फोरम ने 2011 के निष्पादन मामले में कुल 182 साल जेल की सजा सुनाई थी। याचिकाकर्ता राकेश कुमार की तरफ से जिला उपभोक्ता फोरम से 1998 के मामले से उत्पन्न 2011 के निष्पादन मामले में छह महीने के लिए पैरोल बढ़ाने के लिए एक याचिका दायर की गई थी। 

सजा से बचा नहीं जा सकता : कोर्ट
याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति अनूप कुमार मेंदीरत्ता की पीठ ने कहा कि दी गई सजा से बचा नहीं जा सकता है। पैरोल को केवल इस आधार पर जारी नहीं रखा जा सकता है कि याचिकाकर्ता की ओर से प्लॉट खरीदारों के साथ मामलों को निपटाने के लिए धन की व्यवस्था करने का प्रयास किया जा रहा है। पीठ ने कहा कि यह दिल्ली जेल नियम, 2018 के तहत प्रदान की गई फर्लो और पैरोल देने की योजना के विपरीत होगा। यह भी तर्क दिया गया कि यदि याचिकाकर्ता को पैरोल पर रिहा नहीं किया गया तो गंभीर पूर्वाग्रह पैदा होगा, क्योंकि वह राशि की व्यवस्था करने के लिए कानूनी कार्यवाही का पालन करने में सक्षम नहीं हो सकता है।

क्या है मामला
उपभोक्ता विवाद निवारण जिला फोरम द्वारा पारित आदेश के मुताबिक याचिकाकर्ता राकेश कुमार सहित उत्तरदाताओं के खिलाफ 344 शिकायतें दर्ज की गईं थीं। तिरूपति एसोसिएट्स/तिरुपति बिल्डर्स एवं राकेश कुमार दुआ और राजिंदर मित्तल को बकाया राशि 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया। मुआवजे के रूप में 20 हजार रुपये प्रत्येक शिकायतकर्ता को और मुकदमे की लागत के रूप में 500 रुपये दिए जाने के निर्देश दिए थे। याचिकाकर्ता की अपीलें राज्य आयोग द्वारा खारिज कर दी गईं, क्योंकि 344 शिकायतकर्ताओं की ओर से जमा की गई मूल राशि 90 लाख 79 हजार 396 रुपये का भुगतान किया गया था, जो कि भूखंडों की खरीद के लिए जमा की गई थी। क्योंकि अपीलीय फोरम की ओर से बरकरार रखे गए उपभोक्ता फोरम के आदेशों/निर्देशों का अनुपालन नहीं किया गया, याचिकाकर्ता को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 27 के तहत 20 मामलों में प्रत्येक में एक वर्ष के लिए साधारण कारावास की सजा सुनाई गई, जिसमें मूल राशि भी शामिल थी। अन्य 324 मामलों में छह महीने के साधारण कारावास का निर्देश दिया गया। सभी सजाएं अलग-अलग चलने का निर्देश दिया गया था।

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