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हर बार एक ही तरह का बयान कैसे दे नाबालिग रेप पीड़िता, दिल्ली HC ने ऐसा क्यों कहा

दिल्ली हाईकोर्ट ने यौन अपराधी अधिनियम के तहत मिली सजा के खिलाफ अपील करने वाले शख्स की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि गवाह से हर बार एक ही तरह के शब्दों में बताने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

हर बार एक ही तरह का बयान कैसे दे नाबालिग रेप पीड़िता, दिल्ली HC ने ऐसा क्यों कहा
Sneha Baluniलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीFri, 29 Dec 2023 11:48 AM
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला देते एक व्यक्ति की अपील को खारिज कर दिया। शख्स ने पॉक्सो अधिनियम मामले में मिली सजा के खिलाफ अपील दायर की थी। कोर्ट ने कहा कि वह गवाहों से यह उम्मीद नहीं कर सकता है वे घटना से संबंधित 'प्रत्येक विवरण' को 'हर समय एक ही शब्द में' बताए। दरअसल, हाईकोर्ट निचली अदालत के अक्टूबर 2022 के आदेश के खिलाफ की गई अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें 2016 में एक नाबालिग लड़की का यौन उत्पीड़न करने के लिए आईपीसी और पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों के तहत एक व्यक्ति को दोषी ठहराया गया था और 10 साल की सजा सुनाई गई थी। घटना के समय बच्ची की उम्र 13 साल थी।

जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा की एकल पीठ ने 17 नवंबर के अपने आदेश में कहा कि अपीलकर्ता (आदमी) ने तर्क दिया था कि 'गवाहों, विशेषकर नाबालिग पीड़िता के बयानों में भौतिक विरोधाभास थे, जो मामले में सबसे अहम है।' हालांकि, पीड़िता के सभी बयानों और ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड को देखने के बाद, हाईकोर्ट ने माना की नाबालिग लड़की ने सभी प्रमुख पहलुओं पर अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन किया था। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के बयान में कुछ छोटी-मोटी विसंगतियां होना मन की स्थिति और मानव स्मृति की भ्रांतियों के कारण स्वाभाविक है।

कोर्ट ने कहा, 'अदालतों को ऐसे मामलों से निपटने के दौरान रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री के अनुसार बयानों और तथ्यों को देखने की आवश्यकता होती है और गवाहों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वे हर समय घटना से संबंधित प्रत्येक विवरण को एक ही शब्दों में बताएं।' जस्टिस शर्मा ने कहा, 'यह अदालत इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि घटना के समय पीड़िता की उम्र लगभग 13 वर्ष थी और अपीलकर्ता द्वारा उस पर किए गए यौन उत्पीड़न के कारण वह बाद में गर्भवती हो गई थी।'

जस्टिस शर्मा ने आगे कहा, 'ऐसे नाबालिग पीड़ितों के बयानों की जांच आरोपी और पीड़ित को निष्पक्ष आपराधिक मुकदमे के सिद्धांतों के अनुसार न्याय दिलाने के नजरिए से की जानी चाहिए, न कि शब्दों की सख्त तथ्यात्मक सटीकता के पैमाने पर। यह गवाही का सार है जिसकी सराहना की जानी चाहिए। पीड़िता की आर्थिक, वित्तीय और शैक्षिक पृष्ठभूमि, यौन उत्पीड़न और आरोपी के बच्चे को जन्म देने के कारण उसे जो आघात झेलना पड़ा है, उसे किसी भी स्थिति में अदालतों द्वारा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। यह 'बहुत दुर्भाग्यपूर्ण' था कि नाबालिग लड़की ने 'यौन उत्पीड़न के कारण' पैदा हुए बच्चे को तब जन्म दिया जब वह केवल 14-15 साल की थी। अदालत ने कहा कि यौन उत्पीड़न की शिकार होने के कारण 'आरोपी के बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर' होने के कारण लड़की को 'भयंकर दर्द, आघात और तनाव' से गुजरना पड़ा होगा।'

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