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शरीयत एक्ट के तहत घोषणा के बिना भी कोई मुस्लिम गोद ले सकता है बच्चा, कोर्ट का बड़ा फैसला

दिल्ली की एक अदालत ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी मुस्लिम व्यक्ति शरीयत अधिनियम के तहत घोषणा किए बिना भी बच्चे को गोद ले सकता है। यह गोद लेना सामान्य कानून द्वारा शासित माना जाएगा...

शरीयत एक्ट के तहत घोषणा के बिना भी कोई मुस्लिम गोद ले सकता है बच्चा, कोर्ट का बड़ा फैसला
Krishna Singhएएनआई,नई दिल्लीMon, 05 Feb 2024 12:17 AM
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दिल्ली की एक अदालत ने बंटवारे के एक मुकदमे को खारिज करते हुए कहा है कि मुस्लिम समुदाय (Muslim Community) से संबंधित कोई भी व्यक्ति शरीयत अधिनियम के तहत घोषणा किए बिना बच्चे को गोद ले सकता है। फैसले के अनुसार, ऐसा कोई भी गोद लेना सामान्य कानून द्वारा शासित माना जाएगा, ना कि मुस्लिम पर्सनल लॉ द्वारा। अदालत ने कहा, उक्त बच्चा अपने दत्तक माता-पिता का वैध बच्चा बन जाएगा।अदालत जमीर अहमद नाम के मृत व्यक्ति के भाई की ओर से दाखिल एक विभाजन मुकदमे पर सुनवाई कर रही थी।

इस मामले में जमीर के भाई ने उसकी संपत्ति में हिस्सा मांगा था। जमीर अहमद की विधवा के लिए एक-चौथाई हिस्सा छोड़ा गया था, क्योंकि दंपति का कोई बेटा नहीं था। हालांकि, जमीर अहमद और उनकी पत्नी गुलजारो बेगम ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत कोई हलाफनामा दिए बिना, अब्दुल समद उर्फ ​​समीर नाम के एक बच्चे को गोद लिया था।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एडीजे) परवीन सिंह ने कहा कि कानून के तहत भले ही कोई मुस्लिम शख्स जिसने शरीयत अधिनियम की धारा 3 के तहत हलफनामा दायर नहीं किया है, वह एक बच्चे को गोद ले सकता है। यही नहीं यह बच्चा वैध भी माना जाएगा। दत्तक को सगे रिश्ते की तरह ही माता-पिता में सभी अधिकार, विशेषाधिकार और जिम्मेदारियां प्राप्त होंगी। 

एडीजे परवीन सिंह ने 3 फरवरी को दिए गए अपने फैसले में कहा कि कोई सबूत या दावा भी नहीं है कि मृतक जमीर अहमद ने शरीयत अधिनियम की धारा 3 के तहत कोई घोषणा दायर की थी। इससे साबित होता है कि मृतक जमीर अहमद ने गोद लेने के विषय पर मुस्लिम पर्सनल लॉ द्वारा शासित नहीं होने का फैसला किया था। यदि उसने एक बच्चे को गोद लिया था जैसा कि प्रतिवादी नंबर 1 (गुलजारो बेगम) ने दावा किया है, तो उक्त गोद लेना कानूनन उचित माना जाएगा। 

फैसला सुनाते समय अपर जिला जज सिंह ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये पिछले फैसले की भी चर्चा की। अदालत ने कहा कि जिस मुस्लिम ने शरीयत अधिनियम की धारा 3 के तहत कोई घोषणा पत्र दाखिल नहीं किया है, वह गोद लेने, वसीयत और विरासत के विषयों पर मुस्लिम पर्सनल लॉ/शरीयत द्वारा शासित नहीं माना जाएगा। ऐसे व्यक्ति के मामले में, मुस्लिम पर्सनल लॉ को इन विषयों पर लागू नहीं किया जा सकता है।  

जमीर अहमद के भाई इकबाल अहमद द्वारा मुस्लिम कानून के अनुसार, डिक्री की मांग करते हुए एक विभाजन मुकदमा दायर किया गया था। मुकदमे में जमीर अहमद की विधवा और उनके अन्य भाई-बहनों को प्रतिवादी बनाया गया था। मुकदमे में दावा किया गया कि मृतक जमीर अहमद की 3 जुलाई 2008 को निःसंतान मृत्यु हो गई। ऐसे एक मुस्लिम होने के नाते जमीर की संपत्ति की विरासत शरीयत/मुस्लिम कानून द्वारा शासित होगी। वादी ने दावा किया कि जमीर की विधवा संपत्तियों में 1/4 की हिस्सेदारी है। 

यही नहीं जमीर अहमद की तीन बहनें, उनके द्वारा छोड़ी गई संपत्तियों में 15 प्रतिशत हिस्सेदारी की हकदार थीं। बाकी की 60 फीसदी संपत्ति जमीर अहमद एवं उसके अन्य पांच भाइयों को दी जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि चूंकि मृतक जमीर अहमद का एक दत्तक पुत्र था और उक्त पुत्र को जैविक पुत्र के समान दर्जा प्राप्त है। यही नहीं उस रिश्ते से जुड़े सभी अधिकार, विशेषाधिकार और जिम्मेदारिया हैं। इसलिए उसे पुत्र माना जाना चाहिए। इसलिए संपत्ति में वादी और प्रतिवादी के भाई-बहन विभाजन के हकदार नहीं हैं। 

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