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दिल्ली-एनसीआर में मासूमों की मौत का कारण बन रही NICU की सस्ती सुविधा

पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार स्थित न्यू बोर्न बेबी केयर अस्पताल में आग लगने की घटना से भले ही सरकारी तंत्र की नींद टूटी है, लेकिन सच्चाई यह है कि सस्ती सुविधाएं मासूमों की मौत का कारण बन रही हैं।

दिल्ली-एनसीआर में मासूमों की मौत का कारण बन रही NICU की सस्ती सुविधा
Praveen Sharmaनई दिल्ली। हिन्दुस्तानTue, 28 May 2024 06:45 AM
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पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार स्थित न्यू बोर्न बेबी केयर अस्पताल में आग लगने की घटना से भले ही सरकारी तंत्र की नींद टूटी है, लेकिन सच्चाई यह है कि सस्ती सुविधाएं मासूमों की मौत का कारण बन रही हैं। महंगे नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) का खर्च उठाने में असमर्थ परिजन ऐसे अस्पतालों का रुख करते हैं, जिससे यह धंधा परवान चढ़ रहा है।

अस्पताल ने अपनी वेबसाइट पर कहा है कि यह नवजात शिशुओं, खासतौर पर समय से पहले जन्मे और बेहद कम वजन वाले बच्चों के लिए समर्पित संस्थान है। यह भी दावा किया है कि यह अस्पताल दिल्ली-एनसीआर में सबसे किफायती है, जहां एनआईसीयू की सुविधा भी कम रुपये में मिलती है। देखभाल में कोई समझौता नहीं किया जाता है। हालांकि, जांच टीमों ने पाया कि दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय द्वारा जारी अस्पताल के संचालन का लाइसेंस 31 मार्च को समाप्त हो गया था। अब अमान्य हो चुके परमिट में भी केवल पांच बिस्तरों की अनुमति थी, लेकिन घटना के समय वहां 12 नवजात भर्ती थे।

दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सेवा विभाग में कार्यरत रहे एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ऐसी सस्ती सुविधाओं की मांग बहुत अधिक है, जिसकी पूर्ति नहीं हो पा रही है। यही कारण है कि यह धंधा फल-फूल रहा है।

एमबीबीएस या एमडी की डिग्री होना अनिवार्य

पुलिस के अनुसार, अस्पताल में ऐसे डॉक्टर काम कर रहे थे जिनके पास आयुर्वेदिक चिकित्सा और सर्जरी में स्नातक की डिग्री थी, न कि एमबीबीएस या एमडी की डिग्री। इस तरह वह नवजात शिशुओं की गहन देखभाल में इलाज करने के लिए योग्य नहीं थे।

ज्यादातर अस्पतालों में पर्याप्त इंतजाम नहीं

2020 के लैंसेट के अध्ययन में कहा गया है, भारत को श्रेणी तीन के 20 से 30 हजार एनआईसीयू बिस्तर और जबकि श्रेणी दो के 75 हजार से एक लाख विशेष नवजात शिशु देखभाल बेड की आवश्यकता है, परंतु यहां पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं।

विशेषज्ञ बोले- मजबूर होकर बच्चों को भर्ती कराते हैं...
 
विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली और उसके आसपास के शहरों में ऐसे कई क्लीनिक बिना किसी उचित अनुमति, बुनियादी ढांचे व कम स्टाफ के साथ संचालित हो रहे हैं। किसी भी प्रमुख निजी अस्पताल में एनआईसीयू का खर्च रोजाना लाखों में होता है, जिसे ज्यादा लोग वहन नहीं कर पाते हैं। अधिकांश मामलों में स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पाता है। सरकारी अस्पतालों में बिस्तर मिलना मुश्किल हो जाता है, इसलिए मजबूर होकर लोग सस्ती सुविधाओं को लेते हैं।