वोटर लिस्ट मामले में FIR की मांग पर सोनिया गांधी ने जवाब दाखिल किया, 25 जुलाई को सुनवाई
वरिष्ठ कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने कोर्ट में जवाब दाखिल किया है। मामला भारतीय नागरिक बनने से पहले ही वोटर लिस्ट में उनका नाम शामिल करने के आरोपों से जुड़ा है। इस मामले में उन पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिए 25 जुलाई की तारीख तय की है।

कांग्रेस की सीनियर नेता सोनिया गांधी ने शनिवार को कोर्ट में एक अर्जी पर जवाब दाखिल किया। यह अर्जी उस मामले से जुड़ी है, जिसमें आरोप है कि भारतीय नागरिक बनने से पहले ही वोटर लिस्ट में उनका नाम शामिल कर लिया गया था। यह जवाब वकील विकास त्रिपाठी की ओर से दाखिल की गई एक रिविजन याचिका के संदर्भ में दिया गया है। उनकी शिकायत को मजिस्ट्रेट कोर्ट ने खारिज कर दिया था। उनकी रिविजन याचिका अभी सेशंस कोर्ट में लंबित है। वह सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग कर रहे हैं।
सोनिया गांधी की ओर से एक सीनियर वकील ने स्पेशल जज विशाल गोगने के समक्ष यह जवाब दाखिल किया। स्पेशल जज ने अपने 4 जुलाई के आदेश में लिखा कि याचिकाकर्ता की अतिरिक्त दस्तावेजों से जुड़ी अर्जी पर प्रतिवादी नंबर 2 (सोनिया गांधी) की ओर से जवाब दाखिल कर दिया गया है। इसकी एक कॉपी याचिकाकर्ता को दे दी गई है। दोनों पक्षों के अनुरोध पर कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिए 25 जुलाई की तारीख तय की है।
वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने से जुड़ा है मामला
यह मामला वोटर लिस्ट में सोनिया गांधी का नाम शामिल किए जाने से जुड़ा है, जो कथित तौर पर उनके भारत का नागरिक बनने से पहले किया गया था। 16 मई को विकास त्रिपाठी की ओर से एक अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने के लिए अर्जी दाखिल की गई थी। 18 अप्रैल को एक दस्तावेज रिकॉर्ड पर रखने की अनुमति मांगी गई, जो 1980 के चुनाव आयोग की रिपोर्ट थी। इसके बाद विकास त्रिपाठी ने अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने की अर्जी दी। 30 मार्च को कोर्ट ने सोनिया गांधी के खिलाफ शिकायतकर्ता की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने सोनिया गांधी के वकील की बात भी सुनी।
कोर्ट ने सोनिया गांधी के वकील से पूछा कि आप इस बात का क्या जवाब देंगे कि सोनिया गांधी 1983 में भारत की नागरिक बनने से पहले ही वोटर बन गई थीं? इस पर सोनिया गांधी के वकील सीनियर एडवोकेट आर.एस. चीमा ने कहा कि यह बिना किसी ठोस आधार के की जा रही जांच है।
भारतीय नागरिक बने बिना नाम शामिल करवाना मुमकिन नहीं
शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी की ओर से सीनियर एडवोकेट अजय बर्मन और एडवोकेट नीरज पेश हुए। बर्मन ने दलील दी कि भारतीय नागरिक बने बिना वोटर लिस्ट में नाम शामिल करवाना मुमकिन नहीं था। हम कोर्ट को यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि ऐसा सिर्फ जाली दस्तावेजों या धोखाधड़ी से ही किया जा सकता था।
मामला लगभग 50 साल पुराना
कोर्ट ने कहा था कि आप यहां एफआईआर दर्ज कराने की मांग लेकर आए हैं। यह मामला लगभग 50 साल पुराना है। किसकी जांच होगी? आप मामले का दायरा बढ़ा रहे हैं। याचिकाकर्ता के वकील विकास त्रिपाठी ने कहा कि उन्हें यह बात पता है। हमने अब चुनाव आयोग से इसकी एक कॉपी ले ली है। हमने वोटर लिस्ट की कॉपी के लिए आवेदन किया था और हमें सर्टिफाइड कॉपी मिल गई है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा था कि अभी तक आप जो जानकारी दे रहे हैं, वह सिर्फ नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया से जुड़ी है। यह मामला एक विदेशी नागरिक द्वारा दिए गए घोषणा-पत्र से जुड़ा है।
जाली दस्तावेजों और धोखाधड़ी की जांच की मांग
शिकायतकर्ता के वकील ने कहा कि हम यह दिखा सकते हैं कि पहली नजर में गलत घोषणा की गई थी और इसकी जांच होनी चाहिए। सीनियर वकील ने कहा कि हम जाली दस्तावेजों और धोखाधड़ी की जांच की मांग कर रहे हैं। कोर्ट उस आदेश के खिलाफ दायर रिविजन याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से इनकार कर दिया गया था। विकास त्रिपाठी ने सोनिया गांधी के खिलाफ एक अर्जी दी थी, जिसे राउज एवेन्यू कोर्ट के एसीजेएम ने खारिज कर दिया था।
लेखक के बारे में
Subodh Kumar Mishraसुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
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