जब प्याज के लिए सरकारें गिर सकती हैं तो…; सोनम वांगचुक की लोगों से क्या अपील
शिक्षाविद् और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का अनशन आज 21वें दिन में प्रवेश कर दिया। इस बीच उन्होंने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा कि उनका दिमाग अभी ठीक है। इसे साबित करने के लिए उन्होंने प्याज का उदाहरण दिया। साथ ही लोगों से 20 जुलाई को भारी संख्या में संसद मार्च में भाग लेने का आह्वान किया।

शिक्षाविद् और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक कॉकरोच जनता पार्टी की मांगों के समर्थन में पिछले 21 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। इस बीच, उन्होंने एक वीडियो संदेश जारी किया है। अपने इस संदेश में उन्होंने कहा कि मैं अभी जिंदा हूं। लगभग 20 प्रतिशत मेरे शरीर का चला गया है। फैट्स के बाद मसल्स गए हैं। उसके बाद शरीर के अंग जाएंगे। आखिर में दिमाग यानी कि ब्रेन जाएगा। हालांकि, अभी यह नौबत नहीं आई है।
अब तो आप लोग सोच रहे होंगे कि…
वांगचुक ने कहा कि उनके अनशन का आज बीसवां दिन खत्म हो रहा है। चलिए मैं साबित करता हूं कि मेरा दिमाग अभी भी ठीक है। यहां बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या इस आंदोलन से जवाबदेही आएगी। क्या शिक्षा मंत्री इस्तीफा देंगे आप लोगों के इस आंदोलन से। मैं आप लोगों से पूछता हूं कि भारत की जनता को अपने बच्चों की जान और जिंदगी यानी कि शिक्षा ज्यादा प्यारी है या प्याज। अब तो आप लोग सोच रहे होंगे कि इसका तो दिमाग भी गया है। बताता हूं।
जनता की आंदोलन से 3 बार सरकारें गिरीं
वांगचुक ने कहा कि आपको पता है भारत की जनता की आंदोलन की ताकत। तीन बार भारत में सरकारें गिरीं। एक बार 1980 में केंद्रीय सरकार गिरी। 1998 में दिल्ली की सरकार गिरी। और उसी साल राजस्थान की सरकार गिरी जनता की आंदोलन की वजह से। और वो आंदोलन किस बात को लेकर थी। प्याज यानी ओनियन क्राइसिस को लेकर।
मैं तो एक अकेला, भूखा और…
वांगचुक ने कहा कि प्याज की कीमत से भारत में सरकारें गिरती हैं और हम यहां बात कर रहे हैं बच्चों के जीवन की। 20 से ज्यादा आत्महत्याएं हुई हैं इस साल। और भी होंगे इससे दोगुना और चौगुना अगले सालों में। आपके घर की बारी भी आएगी। तो क्या इस आंदोलन से एक जवाबदेही तक नहीं आएगी। क्या एक इस्तीफा नहीं होगी। 20 जुलाई को मेरे साथ संसद की तरफ मार्च कीजिएगा। हमारी ताकत आप ही हैं। वरना मैं कौन होता हूं, मैं क्या होता हूं। मैं तो एक अकेला, भूखा और नाचीज इंसान हूं। आप लोग हैं, आप लोग जुड़ेंगे वही ताकत है। जिसने प्याज के लिए सरकारों को गिराया। हम तो सिर्फ जवाबदेही की बात कर रहे हैं। मिलते हैं 20 जुलाई को।
लगातार गिर रही है तबीयत
बता दें कि सोनम वांगचुक पिछले 20 दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल कर रहे हैं। उनकी तबीयत लगातार गिर रही है। डॉक्टरों का कहना है कि लंबे समय तक खाना नहीं खाने की वजह से स्थिति अब बेहद नाजुक हो चुकी है। इसका असर उनके शरीर के अंगों पर भी पड़ सकता है। डॉक्टरों ने ऑर्गन फेलियर की चेतावनी दी है। उधर, वांगचुक की बिगड़ती सेहत को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि उनकी स्वास्थ्य स्थिति की रोजाना निगरानी की जाए और जरूरत पड़ने पर उन्हें तुरंत उचित चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाए।
लेखक के बारे में
Subodh Kumar Mishraसुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
ज्यादातर नेशनल और स्टेट डेस्क पर काम करने का अवसर मिलने के कारण राजनीतिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी बढ़ती गई। कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खबरों की पैकेजिंग टीम का हिस्सा रहने के कारण भारतीय राजनीति के गुणा-भाग को समझने का मौका मिला।
शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।


