
दिल्ली पुलिस के पूर्व कमिश्नर के खिलाफ होगी FIR, SC ने कहा- ‘जो जांच करते हैं उनकी भी जांच होनी चाहिए’
सर्वोच्च न्यायालय ने 24 साल पुराने इस मामले में सच्चाई का पता लगाने के लिए तत्कालीन सीबीआई अधिकारी और पूर्व दिल्ली पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार के खिलाफ मामला दर्ज करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि आम जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए कभी-कभी जांच करने वालों की भी जांच होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने करीब 24 साल पुराने एक मामले में दिल्ली पुलिस के पूर्व कमिश्नर नीरज कुमार के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया है। बुधवार को इस मामले में हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि जांच करने वालों की भी जांच होनी चाहिए। कोर्ट ने मामले की जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और एसीपी रैंक से नीचे के किसी अधिकारी द्वारा करवाने और तीन महीने के अंदर जांच पूरी करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि पहले ही काफी देर हो चुकी है, इसलिए जांच जल्दी पूरी होनी चाहिए। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने न्याय के उस मूल सिद्धांत को भी रेखांकित किया जो कहता है कि 'न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए।'

अधिकारी भी ले सकेंगे जांच में भाग
अदालत के सामने आया यह मामला साल 2001 में हुई एक घटना से जुड़ा है, जब नीरज कुमार सीबीआई में संयुक्त निदेशक के पद पर तैनात थे और इसी दौरान उन पर और एक अन्य अधिकारी पर एक मामले के दस्तावेजों में हेराफेरी करने और आपराधिक धमकी देने का आरोप है। शीर्ष अदालत ने कहा कि दोनों अधिकारियों को भी इस जांच में भाग लेने का अधिकार होगा, ताकि वह यह साबित कर सकें कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है।
SC ने कहा- जांच करने वालों की भी जांच होनी चाहिए
इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने 13 मार्च, 2019 को कुमार और तत्कालीन सीबीआई अधिकारी विनोद कुमार पांडे के खिलाफ FIR दर्ज करने के अपनी एकल जज बेंच के साल 2006 में दिए आदेश को बरकरार रखा था और इसके खिलाफ दायर अपीलों को खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट के इसी आदेश को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
दिल्ली उच्च न्यायालय के उसी आदेश को बरकरार रखते हुए, शीर्ष अदालत ने मामले की जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और एसीपी रैंक से नीचे के किसी अधिकारी द्वारा करवाने के निर्देश दिए। बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने कहा, 'यह सही समय है कि व्यवस्था में आम जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए कभी-कभी जांच करने वालों की भी जांच होनी चाहिए।'
साल 2001 और 2004 में की गई थी शिकायत
मामले की सुनवाई के दौरान यह बात अदालत के रिकॉर्ड में आई कि दो अलग-अलग व्यक्तियों शीश राम सैनी और विजय कुमार अग्रवाल ने इस मामले को लेकर 5 जुलाई, 2001 और 23 फरवरी, 2004 को पुलिस के सामने अलग-अलग शिकायतें दर्ज कराते हुए जांच की मांग की थी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इनमें से एक शिकायतकर्ता सैनी ने तत्कालीन सीबीआई अधिकारियों कुमार और पांडे पर दस्तावेजों में हेराफेरी का आरोप लगाया था, वहीं अग्रवाल ने कुमार के कहने पर पांडे द्वारा आपराधिक रूप से धमकाए जाने का आरोप लगाया था।
पीठ ने कहा, ‘यह अपराध साल 2000 में किया गया था और आज तक इसकी जांच नहीं होने दी गई। अगर ऐसे अपराध की जांच नहीं की जाती, खासकर जब इसमें सीबीआई में प्रतिनियुक्ति पर तैनात अधिकारियों की मिलीभगत हो, तो यह न्याय के साथ खिलवाड़ होगा।’
उस समय अग्रवाल और उनके भाई व विवादास्पद पूर्व ईडी अधिकारी अशोक अग्रवाल के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई द्वारा जांच की जा रही थी। शीर्ष अदालत ने बताया कि जब पुलिस अधिकारियों ने इस आधार पर उनकी शिकायतों पर विचार करने में अनिच्छा व्यक्त की कि सीबीआई अधिकारियों की जांच करना उचित नहीं है, तो शिकायतकर्ताओं ने उच्च न्यायालय का रुख किया।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, ‘पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जांच के बाद टीम के अधिकारी जांच के दौरान एकत्रित सामग्री पर विचार करते हुए, एक क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकते हैं या आरोप पत्र दाखिल कर सकते हैं। यदि क्लोजर रिपोर्ट दायर की जाती है और मजिस्ट्रेट द्वारा स्वीकार कर ली जाती है, तो अपीलकर्ताओं को कोई शिकायत नहीं होगी।’



