
रिश्तेदार को छोड़ने गया, दुनिया ही छोड़ गया; दिल्ली धमाके में बुझा घर का चिराग
संक्षेप: लाल किला ब्लास्ट में जान गंवाने वाला 22 वर्षीय कैब ड्राइवर पंकज सहनी, सोमवार शाम रिश्तेदार को पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन छोड़ने गया था, जिसके घर में शादी की बातें चल रही थीं।
लालकिले के पास हुए ब्लास्ट में जान गंवाने वाला 22 वर्षीय पंकज सहनी सोमवार शाम को कैब से अपने रिश्तेदार को छोड़ने पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन गया था, लेकिन फिर घर नहीं लौटा। विस्फोट ने उनके घर के बड़े चिराग को बुझा दिया।

परिवार के लोगों को विश्वास नहीं हो पा रहा है कि एक झटके में ही उनका लाडला उनसे दूर हो गया। कहां, घर में उसकी शादी की बातें चल रही थीं। परिजनों ने कई सपने संजो रखे थे। वह सब इस धमाके में खाक हो गए।
पंकज मूलरूप से बिहार के समस्तीपुर जिले के खानपुर थाना क्षेत्र के हसनपुर पंचायत के फतेहपुर गांव का रहने वाला था। उसके चाचा रामदेव सहनी ने बताया कि पंकज के पिता बालक राम सहनी पिछले करीब 29 वर्षों से कंझावला के नजदीक उपकार विहार दिल्ली में रहते हैं और टैक्सी चलाकर परिवार का भरण पोषण करते हैं। उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं। पंकज भाई-बहनों में वह सबसे बड़ा था। वह बेहद सीधा था और पिता के काम में मदद करने लगा था।
उसने 12वीं तक दिल्ली में ही पढ़ाई की लेकिन पढ़ाई-लिखाई में ज्यादा मन नहीं लगा। इसलिए पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए दो-तीन वर्षों से कैब चलने लगा था और वह पिता के कामकाज में सहारा दे रहा था। अभी उसकी शादी नहीं हुई थी। शादी के लिए बातचीत चल रही थी। किसी को क्या मालूम था कि वह हमें इस तरह छोड़कर इस दुनिया से चला जाएगा।
उन्होंने बताया कि घटना के वक्त उसकी कैब में कोई नहीं था। लालकिले के पास विस्फोट की बात जानकर परिवार के लोगों के हाथ पैर फूल रहे थे। घटना स्थल पर उसकी वैगनार कार के परखच्चे उड़ गए थे। गाड़ी के नंबर और कपड़ों से पंकज की पहचान हुई। पुलिस ने फोन कर घटना की सूचना उसके पिता को दी। घटना के बारे में जानकर ऐसा लगा मानों किसी ने पांव तले जमीन खींच ली।
दादा ने शाम साढ़े चार बजे की थी बात
पंकज के दादा बालेश्वर सहनी ने बताया कि पंकज ने शाम करीब 4:30 बजे उन्हें फोन किया था। वह बिल्कुल सामान्य तरीके से बात कर रहा था, जैसे रोज करता था। किसी को क्या पता था कि यही उसकी आखिरी आवाज़ होगी, आखिरी संवाद होगा। दादा अपने पोते की मौत की खबर सुनकर पूरी तरह टूट चुके हैं। पोते को याद कर दादा बालेश्वर सहनी की आंखें डबडबा जा रही थीं।





