सिर्फ लाइन पार नहीं की बल्कि उसे लांघ दिया; SC का जज बनकर केस को प्रभावित करने के मामले में सुकेश दोषी करार
शिकायतकर्ता विशेष जज की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए कोर्ट ने कहा कि उन्होंने फोन आने के बाद सुप्रीम कोर्ट से संपर्क कर इसकी पुष्टि की और उसके बाद शिकायत दर्ज कराई। इसे शिकायत में देरी नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि उनकी गवाही स्पष्ट, एकरूप और तत्काल उपलब्ध रिकॉर्ड से पुष्ट थी।

रिपोर्ट- निखिल पाठक
दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने कुख्यात ठग सुकेश चंद्रशेखर को विशेष न्यायाधीश पर दबाव डालने के मामले में दोषी करार दे दिया है। सुकेश ने सुप्रीम कोर्ट का जज बनकर निचली अदालत के जज को फोन लगाते हुए उन पर दबाव बनाने की कोशिश की थी। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हर्षिता मिश्रा की अदालत ने 121 पन्नों के फैसले में कहा कि यह महज धोखाधड़ी या खुद को कोई और व्यक्ति बताने का मामला नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता और उसकी पवित्रता को प्रभावित करने की कोशिश है। सजा पर फैसला कल 27 अगस्त को सुनाया जाएगा। हालांकि अदालत के निर्णय के खिलाफ सुकेश ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख करते हुए याचिका दायर कर दी है।
मामले पर फैसला सुनाने से पहले तीस हजारी कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जज का लिबास पहनना धोखेबाजों के लिए कोई वेशभूषा नहीं है। अदालत ने सुकेश को भारतीय दंड संहिता की धारा 170 (किसी लोक सेवक का झूठा रूप धारण करने), 189 (किसी लोक सेवक को उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा डालने) और 507 (गुमनाम संचार के जरिए आपराधिक धमकी) के तहत दोषी ठहराया। 'बार एंड बेंच' की रिपोर्ट के अनुसार, फैसला सुनाते हुए अदालत ने यह भी कहा कि 'इस ठग ने न केवल सीमा पार की, बल्कि उसे लांघ ही गया।
हिरासत में रहते हुए लगाया था जज को फोन
यह मामला अप्रैल 2017 का है। सुकेश एक भ्रष्टाचार मामले में पुलिस हिरासत में था। अभियोजन के मुताबिक, हिरासत में रहने के दौरान उसने पुलिस कांस्टेबल मंजीत के मोबाइल फोन को किसी तरह हासिल किया और उससे तत्कालीन विशेष न्यायाधीश पूनम चौधरी के सरकारी लैंडलाइन और निजी मोबाइल पर फोन किया, चौधरी ही उसके खिलाफ चल रहे मामले की सुनवाई कर रही थीं। आरोप है कि इस दौरान फोन पर उसने पहले सुप्रीम कोर्ट में तत्कालीन न्यायाधीश के निजी सचिव के तौर पर अपनी पहचान बताई और बाद में खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज बताते हुए सुकेश को जल्द से जल्द जमानत देने के लिए दबाव बनाया। इतना ही नहीं, जमानत नहीं देने पर न्यायिक अधिकारी को उनके पेशेवर भविष्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की धमकी भी दी।
‘यह दुस्साहस व झूठ की सीमा का मामला’
अदालत ने अपने फैसले की शुरुआत में कहा कि कुछ मामले कानून की परीक्षा लेते हैं, कुछ साक्ष्यों की और कुछ मानवीय दुस्साहस व झूठ की सीमा की। अदालत के अनुसार, यह मामला दुर्भाग्य से तीसरी श्रेणी का है। न्यायिक अधिकारी को निजी फोन कॉल के जरिए प्रभावित करने की कोशिश न्याय व्यवस्था की उस बुनियाद पर हमला है, जिसके तहत न्यायिक फैसले केवल कानून और साक्ष्यों के आधार पर लिए जाते हैं, न कि किसी निजी बातचीत, दबाव या धोखे के आधार पर।
'यह संस्थागत व्यवस्था को चुनौती देने जैसा'
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को निजी फोन कॉल के जरिए किसी जज को किसी खास तरीके से फैसला देने का आदेश देने का अधिकार नहीं है। न्यायिक आदेश अदालत में पारित होते हैं, गुप्त फोन कॉल के जरिए नहीं। अदालत ने यह भी कहा कि सुकेश ने फर्जी कॉलर आईडी, आवाज में बदलाव और प्रभावशाली पहचान के जरिए यह मान लिया था कि वह न्यायिक प्रक्रिया को अपने हिसाब से मोड़ सकता है। किसी अधिकारी या राजनीतिक बिचौलिए का रूप धारण करना एक तरह का लेन-देन आधारित अपराध हो सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज या उनके सचिव का रूप धारण करना संस्थागत व्यवस्था को चुनौती देने जैसा है।
जज की गवाही को माना विश्ववसनीय
शिकायतकर्ता विशेष जज की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए कोर्ट ने कहा कि उन्होंने फोन आने के बाद सुप्रीम कोर्ट से संपर्क कर इसकी पुष्टि की और उसके बाद शिकायत दर्ज कराई। इसे शिकायत में देरी नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि उनकी गवाही स्पष्ट, एकरूप और तत्काल उपलब्ध रिकॉर्ड से पुष्ट थी। अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि न्यायिक अधिकारी का फोन नंबर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होने के कारण सुकेश के पास वह नंबर नहीं हो सकता था। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों के फोन नंबर जरूरी नहीं कि गोपनीय हों। एक शातिर ठग को अपराध करने के लिए फोन डायरेक्टरी की जरूरत नहीं होती, बल्कि जानकारी, सूझबूझ और इरादा पर्याप्त हो सकता है।
पुलिस जांच पर कोर्ट सख्त
अदालत ने दिल्ली पुलिस की जांच को बेहद लापरवाह और सतही बताया। कोर्ट ने सवाल उठाया कि पुलिस हिरासत में रहने के बावजूद सुकेश को कांस्टेबल के सुरक्षित मोबाइल तक पहुंच कैसे मिली। मोबाइल बरामद नहीं करने, सीसीटीवी फुटेज और महत्वपूर्ण कॉल रिकॉर्ड जुटाने में विफल रहने पर भी अदालत ने नाराजगी जताई। कोर्ट ने कांस्टेबल मंजीत की भूमिका की नए सिरे से जांच के निर्देश दिए हैं। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि कांस्टेबल के खिलाफ अभी कोई दोषसिद्धि नहीं हुई है।
दोषसिद्धि को हाईकोर्ट में दी चुनौती
तीस हजारी कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद सुकेश ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। उसने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि को रद्द करने और फैसले में की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों को हटाने की मांग की है। याचिका में निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के उल्लंघन, न्यायिक पक्षपात और रिकॉर्ड से परे टिप्पणियां किए जाने का आरोप लगाया है। सुकेश के अधिवक्ता अनंत मलिक के मुताबिक, हाईकोर्ट में याचिका पर 31 अगस्त को सुनवाई होगी। सुकेश ने सजा की कार्यवाही पर रोक लगाने की भी मांग की है।


