
नोएडा में महिला वकील को थाने में बंधक बनाने का आरोप, SC ने केंद्र-यूपी सरकार से जवाब मांगा
नोएडा के सेक्टर-126 थाने में महिला वकील को बंधक बनाने और यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व यूपी सरकार से जवाब मांगा है और थाने के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश दिया है।
नोएडा के थाने में एक महिला वकील को कई घंटे तक बंधक बनाने और यौन शोषण के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर के पुलिस आयुक्त को घटना वाले दिन का पुलिस स्टेशन में लगे कैमरे की फुटेज को डिलीट नहीं करने और सीलबंद लिफाफे में रखने का आदेश दिया है। महिला वकील ने सुप्रीम कोर्ट से उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को घटना के दिन सेक्टर-126 पुलिस स्टेशन में तैनात पुलिस अधिकारियों के खिलाफ तुरंत प्राथमिकी दर्ज कराने और यूपी सरकार को मामले की जांच एसआईटी या सीबीआई को सौंपने की मांग की है।
जस्टिस विक्रम नाथ और एनवी अंजारिया की पीठ ने पीड़ित वकील की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई की। याचिका में दावा किया गया है कि तीन दिसंबर की रात को पुलिस स्टेशन में पुलिसकर्मियों द्वारा उसे 14 घंटे तक अवैध तरीके से हिरासत में रखा गया। इस दौरान यौन उत्पीड़न करने के साथ जबरदस्ती का सामना करना पड़ा, जब वह अपने मुवक्किल के प्रति अपना पेशेवर कर्तव्य निभा रही थी। पीठ ने मामले में केंद्र और यूपी सरकार के साथ गौतमबुद्ध नगर के पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर मामले की अगली सुनवाई सात जनवरी तक जवाब दाखिल करने का आदेश दिया।
डीसीपी नोएडा यमुना प्रसाद ने कहा कि यह दो पक्षों के बीच का मामला था। एक पक्ष की तरफ से महिला अधिवक्ता भी थाने आई थीं। अब उनका कहना है कि उस समय उनके साथ थाने में अभद्रता हुई। पुलिस अपने स्तर से पूरे प्रकरण की जांच कर रही है। न्यायालय के सभी निर्देशों का पालन किया जाएगा।
पीड़ित महिला के अधिवक्ता ने कहा, यह गंभीर मामला
याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने सुप्रीम कोर्ट की पीठ से कहा कि यह बहुत ही गंभीर मामला है, जहां एक महिला वकील के साथ यौन दुर्व्यवहार किया गया और उसे अवैध रूप से हिरासत में रखा गया।
अगर यह सब दिल्ली के पास नोएडा में हो रहा, तो पूरे देश की हालत की कल्पना कीजिए। पीठ ने कहा कि आम तौर पर वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस याचिका पर विचार नहीं करती और याचिकाकर्ता को संबंधित हाई कोर्ट जाने की स्वतंत्रता देती है। हालांकि, याचिका में लगाए गए गंभीर आरोपों और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि यह मुद्दा पुलिस स्टेशन में घटना की अवधि के दौरान सीसीटीवी कैमरों को ब्लॉक करने से भी संबंधित है, हम इस याचिका पर विचार कर रहे हैं।’ वरिष्ठ अधिवक्ता सिंह ने पीड़ित महिला वकील की सुरक्षा का मुद्दा उठाया। इस पर जस्टिस जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि इस आदेश के बाद वे उसे छूने की हिम्मत नहीं करेंगे। सुनवाई के दौरान, वरिष्ठ अधिवक्ता सिंह ने कहा कि थाने में लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज को तुरंत जब्त किया जाना चाहिए।
उच्च न्यायालय क्यों नहीं गएः सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई की शुरुआत में सवाल किया कि याचिकाकर्ता ने अपनी शिकायत लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट से संपर्क क्यों नहीं किया। हमें पूरी सहानुभूति है। हाईकोर्ट को उचित कार्रवाई करने दें। इस पर महिला अधिवक्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट याचिका को हाईकोर्ट में ट्रांसफर कर सकता है। इस पर पीठ ने कहा कि मुश्किल यह है कि अगर हम इस (याचिका) पर सुनवाई शुरू करते हैं, तो दिल्ली के चारों ओर के सभी मामले सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में ही आएंगे। इसके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता सिंह ने पीठ से इसे एक तरह का टेस्ट केस मानने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही सीसीटीवी मामले की भी निगरानी कर रहा है, जो बहुत महत्वपूर्ण है।
'गर्दन पर पिस्टल रखा गया'
महिला वकील की ओर से याचिका में आरोप लगाया गया कि जब पुलिसकर्मियों ने सरकारी पिस्तौल उसकी गर्दन पर रखकर मोबाइल फोन पासवर्ड सरेंडर करने के लिए मजबूर किया, तो याचिकाकर्ता की जान तुरंत खतरे में पड़ गई। उसे फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने की लगातार धमकियां भी दी गईं। इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि अधिकारियों ने दुर्भावनापूर्ण तरीके से थाने मे लगे सीसीटीवी को बंद कर दिया या हटा दिया, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए अनिवार्य आदेश का घोर उल्लंघन था।





