शारीरिक निष्क्रियता और खराब पर्यावरण से खतरे में खेल की अर्थव्यवस्था : रिपोर्ट
वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की रिपोर्ट में बताया गया है कि आजकल के युवा शारीरिक मेहनत कम कर रहे हैं, जिससे खेलों में भागीदारी घट रही है। जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के कारण प्रतियोगिताएं बाधित हो रही हैं, जिससे खेल उद्योग को हर साल 1.6 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान होने की आशंका है।

वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की रिपोर्ट में जताई गई चिंता रिपोर्ट में दावा,आजकल के युवा पहले के मुकाबले कम शारीरिक मेहनत कर रहे हैं। इसके अलावा बदलते मौसम और प्रदूषण का असर अब सीधे मैदान पर दिख रहा इससे स्पोर्ट्स इंडस्ट्री को हर साल 1.6 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान होगा अभी दुनिया भर में खेल से जुड़ी अर्थव्यवस्था लगभग 2.3 ट्रिलियन डॉलर की है नई दिल्ली, एजेंसी। भारत सहित दुनियाभर में खेल की अर्थव्यवस्था तेजी से फल-फूल रही है, लेकिन इसके भविष्य पर सेहत और पर्यावरण के दोहरे संकट के बादल मंडरा रहे हैं। वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम ने अपनी रिपोर्ट में इसपर चिंता जताई है।
रिपोर्ट के अनुसार युवाओं में बढ़ती शारीरिक निष्क्रियता जमीनी स्तर पर खेलों में भागीदारी को कम कर रही है। वहीं, भीषण गर्मी, प्रदूषण और चरम मौसम के कारण प्रतियोगिताएं बाधित हो रही हैं। खेल जगत खुद भी संसाधनों की भारी खपत और बड़े आयोजनों के जरिए इन पर्यावरणीय दबावों को बढ़ाने में योगदान दे रहा है। यह रिपोर्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी फर्म ओलिवर वायमन के साथ मिलकर तैयार की गई है। हर साल 1.6 ट्रिलियन डॉलर नुकसान का अनुमान रिपोर्ट में बताया गया है कि आज दुनिया में खेलों का कारोबार करीब 2.3 ट्रिलियन डॉलर का है। अनुमान है कि 2050 तक यह क्षेत्र बढ़कर 8.8 ट्रिलियन डॉलर का हो जाएगा। इससे पहले खेल उद्योग के 2030 तक 3.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। लेकिन युवाओं के शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहने और बढ़ते क्लाइमेट चेंज के कारण 2050 तक सालाना 1.6 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। क्यों जताई गई चिंता? विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि 2024 में दुनिया में हर तीन में से एक व्यक्ति पर्याप्त व्यायाम नहीं कर रहा था। सर्वे में पाया गया कि 58% लोग और ज्यादा खेलना चाहते हैं, लेकिन उनके पास समय नहीं है, खेल की फीस महंगी है या उनके पास अच्छे मैदान और सुविधाएं नहीं हैं। मौसम की मार का खेल के मैदानों पर असर बदलता मौसम अब सीधे बड़े मैचों और खिलाड़ियों को नुकसान पहुंचा रहा है। वर्ष 2004 से लेकर 2024 तक 2 हजार से अधिक बड़े खेल के आयोजन प्रभावित हुए हैं। जून 2025 में आयोजित फीफा वर्ल्ड कप के दौरान छह मैच तूफान के कारण देर से हुए। 2040 तक दुनिया में सिर्फ 10 देश ऐसे बचेंगे जहां विंटर ओलंपिक के लिए पर्याप्त बर्फ होगी। भारत पर भी पड़ेगा बुरा असर रिपोर्ट कहती है कि खेल का सामान (बैट, गेंद, जूते, कपड़े आदि) बनाने वाली दुनिया की 80% इंडस्ट्री एशिया-प्रशांत क्षेत्र में है। 2050 तक भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में कपड़ा बनाने वाले मुख्य इलाके पानी की भारी किल्लत का सामना करेंगे। इससे खेल का सामान बनाने वाली फैक्ट्रियां बंद हो सकती हैं या उनका काम रुक सकता है। अनुमान है कि 2030 तक दुनिया में ताजे पानी की मांग उसकी सप्लाई से 40% ज्यादा हो जाएगी। क्रिकेट और फुटबॉल के मैदानों को हरा-भरा रखने के लिए बहुत पानी चाहिए, जो मिलना मुश्किल हो जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार खेल के मामले में भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। भारत न केवल दर्शकों के मामले में, बल्कि कमाई के मामले में भी दुनिया का केंद्र बना रहेगा। समाधान क्या है? खेल जगत को बचाने और उसे बेहतर बनाने के लिए 3 मुख्य रास्ते बताए हैं। संसाधनों की सही देखभाल: धरती के संसाधनों का इस्तेमाल उसकी क्षमता से 1.8 गुना तेजी से किया जा रहा है। खेल का भविष्य तभी बचेगा जब हम कुदरत की सीमाओं में रहेंगे। शहर के बीचों-बीच हो खेल: 2050 तक 70% आबादी शहरों में होगी, इसलिए शहरों को खेल के हिसाब से बदलना होगा। पेरिस ने 2024 ओलंपिक के बहाने अपनी सीन नदी को इतना साफ कर दिया कि अब वह नहाने लायक है। नीदरलैंड में एफ1 रेस देखने वाले 1.1 लाख लोग सिर्फ साइकिल या बस से आए। मकसद के साथ निवेश : निवेशकों और स्पॉन्सर्स को केवल मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि समाज की भलाई के लिए पैसा लगाना चाहिए। ऐसे स्टेडियम बनाए जाएं जो आपदा के समय राहत शिविर का काम कर सकें। जीडीपी में खेल की अर्थव्यवस्था का योगदान देश जीडीपी का योगदान(प्रतिशत में) ऑस्ट्रेलिया 0.8 कनाडा 0.3 चीन 1.2 जर्मनी 3.9 भारत 0.9 जापान 2.0 मोरक्को 2.5 सऊदी अरब 1.0 यूके 2.6
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