महिला दिवस:न्याय की खातिर अब 'चुप्पी' तोड़ रही हैं महिलाएं
महिलाएं अब अन्याय के खिलाफ अपनी चुप्पी तोड़ रही हैं। देशभर में लंबित 4.92 करोड़ मामलों में से 8% मामले महिलाओं द्वारा दायर किए गए हैं। दिल्ली में यह आंकड़ा 7% है। बदलती सामाजिक सोच और कानूनी जागरूकता के चलते महिलाएं अब अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने में पीछे नहीं हट रही हैं।

न्याय की खातिर अब 'चुप्पी' तोड़ रही हैं महिलाएं -राजधानी में कुल लंबित मामलों में से महिलाओं ने दायर किए हैं सात फीसदी मामले-देशभर की बात करें तो आठ फीसदी मुकदमे महिलाओं ने किए हैं दायरनई दिल्ली। निखिल पाठकसामाजिक दबाव, बदनामी का डर और पारिवारिक बंधनों के कारण लंबे समय तक अन्याय सहकर चुप रहने वाली महिलाएं अब अपनी खामोशी तोड़ रही हैं। अपने अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए महिलाएं अब खुलकर बोल रही हैं। बदलती सामाजिक सोच, बढ़ती साक्षरता और कानूनी जागरूकता के चलते महिलाएं अब अन्याय, दर्द व नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठाने से पीछे नहीं हट रहीं।
नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड (एनजेडीजी) के अनुसार, देशभर की अदालतों में लंबित 4,92,69,496 मामलों में से 38,87,295 मुकदमे महिलाओं द्वारा दायर किए गए हैं। यानी देश में लंबित कुल मामलों में से आठ फीसदी ऐसे मामले हैं, जो महिलाओं ने दाखिल किए हैं। वहीं, देश की राजधानी दिल्ली की बात करें तो यहां कुल 15,98,215 मामले लंबित हैं। इनमें से सात फीसदी (1,10,394) मामले महिलाओं ने दर्ज कराए हैं। इनमें से 34,339 मामले सिविल और 76,055 आपराधिक मुकदमे हैं।--------प्रमुख राज्यों के आंकड़ों की स्थितिराज्य कुल लंबित मामले महिलाओं द्वारा दायर मुकदमेउत्तर प्रदेश 1,18,79,694 7,70,979महाराष्ट्र 60,62,320 5,15,242बिहार 37,15,192 3,67,373राजस्थान 26,46,798 1,60,929दिल्ली 15,98,215 1,10,394हरियाणा 15,37,031 1,06,953पंजाब 9,67,598 1,00,277------कानूनी विशेषज्ञों के कोट्समहिलाओं को अक्सर परिवार और समाज से भावनात्मक व नैतिक समर्थन नहीं मिल पाता, जिसके कारण वे पुलिस या अदालत तक पहुंचने में हिचकिचाती थीं। लेकिन अब परिदृश्य बदल रहा है। कानून ने पीड़िता की पहचान गुप्त रखने को अनिवार्य बनाकर उन्हें एक सुरक्षा कवच दिया है। अदालतों ने न केवल दोषियों को कठोर सजा सुनिश्चित की है, बल्कि पीड़िताओं के पुनर्वास और सम्मान की बहाली के लिए मुआवजे का भी प्रावधान किया है। यदि आज मामलों की संख्या बढ़ी हुई दिख रही है, तो इसका मतलब यह नहीं कि अपराध बढ़ गए हैं, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि महिलाएं अब चुप रहने के बजाय न्याय के लिए साहस जुटा रही हैं।-योगिता कौशिक दहिया, अतिरिक्त लोक अभियोजक----अब वो दौर नहीं रहा कि महिला डरकर केस वापस ले लें। आज की महिलाएं जागरूक हैं। उन्हें पता है कि कानून उनकी ढाल है। अदालतों में घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना और पति-पत्नी के बीच विवाद से जुड़े मामले बड़ी संख्या में आते हैं। इसके अलावा संपत्ति में हिस्सेदारी, भरण-पोषण और यौन उत्पीड़न के मामलों में भी अब महिलाएं पहले की तुलना में अधिक जागरूक हुई हैं और अपने अधिकारों के लिए अदालत का सहारा ले रही हैं।-महक अहूजा, अधिवक्ता-----
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