
चिंता : 2050 तक पहाड़ जैसा बढ़ेगा ई-कचरा
एक नई रिसर्च के अनुसार, 2050 तक वियरेबल हेल्थ डिवाइस, जैसे स्मार्टवॉच और ग्लूकोज मॉनिटर, ई-कचरे में भारी वृद्धि का कारण बनेंगे। अनुमान है कि हर साल 10 लाख टन से अधिक ई-कचरा उत्पन्न होगा, जिससे CO2 उत्सर्जन भी बढ़ेगा। भारत और चीन इस समस्या में सबसे आगे होंगे, और भारत में ई-कचरे का निपटान असुरक्षित तरीकों से होता है।
शिकागो, एजेंसी। वियरेबल हेल्थ डिवाइस (जैसे स्मार्टवॉच, ग्लूकोज मॉनिटर और ईसीजी पैच) आने वाले समय में पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती बनने वाले हैं। कॉर्नेल और शिकागो विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की एक ताजा रिसर्च के अनुसार, साल 2050 तक इन गैजेट से होने वाला नुकसान चौंकाने वाला हो सकता है। अनुमान है कि 2050 तक हर साल लगभग 2 अरब वियरेबल डिवाइस बेचे जाएंगे। यह आज की तुलना में 42 गुना ज्यादा है। इनमें सबसे ज्यादा मांग ग्लूकोज मॉनिटर की होगी, जो बाजार का 75 फीसदी हिस्सा कवर करेंगे। इनके कारण 2050 तक सालाना 10 लाख टन से ज्यादा ई-कचरा पैदा होगा।
साथ ही, इनके उत्पादन और इस्तेमाल से करीब 100 मिलियन टन सीओ2 का उत्सर्जन होगा, जो ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाएगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगर हम मॉड्यूलर डिजाइन अपनाएं (जिसमें खराब हिस्सा बदला जा सके और बाकी का दोबारा इस्तेमाल हो), तो पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को आधा किया जा सकता है। बॉक्स - भारत और चीन के लिए खतरे की घंटी 2050 तक वियरेबल डिवाइसेस (जैसे स्मार्टवॉच) से होने वाले ई-कचरे में भारत और चीन सबसे आगे होंगे। भारत पहले से ही दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ई-कचरा पैदा करने वाला देश है। चिंता की बात यह है कि भारत में 90 फीसदी ई-कचरे का निपटान पुराने और असुरक्षित तरीकों से होता है। इससे सीसा और पारा जैसी जहरीली धातुएं हमारी मिट्टी और पानी में मिल रही हैं, जो सेहत के लिए बेहद खतरनाक हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को ईपीआर नियमों को सख्त करना चाहिए, ताकि कंपनियां इन खराब गैजेट को वापस लेकर सही ढंग से रीसायकल करें।

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