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अमेरिकी ई-कचरा से दक्षिण-पूर्व एशिया को गंभीर खतरा

अमेरिकी ई-कचरा से दक्षिण-पूर्व एशिया को गंभीर खतरा

संक्षेप:

अमेरिका से लाखों टन खराब इलेक्ट्रॉनिक सामग्री दक्षिण-पूर्व एशिया के विकासशील देशों में भेजी जा रही है। ये देश इस खतरनाक कचरे के सुरक्षित निस्तारण के लिए तैयार नहीं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी...

Oct 23, 2025 05:41 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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हनोई, एजेंसी। अमेरिका से लाखों टन खराब इलेक्ट्रॉनिक सामग्री (ई-कचरा) दक्षिण-पूर्व एशिया के विकासशील देशों में भेजी जा रही है। ये देश इस खतरनाक कचरे के सुरक्षित निस्तारण के लिए तैयार नहीं हैं, जिस कारण उनपर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। सिएटल स्थित पर्यावरण पर नजर रखने वाली संस्था ‘बासेल एक्शन नेटवर्क (बीएएन) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दो साल तक हुई जांच के अनुसार, कम से कम 10 अमेरिकी कंपनियां ई-कचरे को एशिया और पश्चिम एशिया में निर्यात करती हुई पाई गई हैं। यह ई-कचरे की छिपी हुई सुनामी है।

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ई-कचरों में फोन, कंप्यूटर जैसे खराब और फेंके गए उपकरण हैं, जिनमें लेड (सीसा), कैडमियम और मरकरी (पारा) जैसी मूल्यवान सामग्री और विषाक्त धातु दोनों ही शामिल हैं। जैसे-जैसे गैजेट्स तेजी से बदले जा रहे हैं, वैश्विक ई-कचरा औपचारिक रूप से रीसायकल होने की तुलना में पांच गुना तेजी से बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में वैश्विक स्तर पर 6.2 करोड़ मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ। यह मात्रा 2030 तक बढ़कर 8.2 करोड़ मीट्रिक टन तक पहुंचने की आशंका है। अमेरिकी ई-कचरा एशिया के बोझ को और बढ़ा रहा है, जो पहले से ही दुनिया के कुल ई-कचरे का लगभग आधा उत्पादन करता है। ई-कचरे का अधिकांश हिस्सा लैंडफिल साइटों में फेंक दिया जाता है, जिससे जहरीले रसायन पर्यावरण में रिसते रहते हैं और उसे नुकसान पहुंचाते हैं। कुछ कचरा अनौपचारिक कबाड़खानों तक पहुंच जाता है, जहां मजदूर अक्सर बिना किसी सुरक्षा के उपकरणों के उन्हें हाथ से जलाते या खोलते हैं जिससे विषाक्त धुआं और कचरा निकलता है। रिपोर्ट के अनुसार, हर महीने लगभग 2,000 कंटेनरों में लगभग 33,000 मीट्रिक टन इस्तेमाल किए गए इलेक्ट्रॉनिक्स अमेरिकी बंदरगाहों से बाहर भेजे जाते हैं। इसके मुताबिक इन खेपों की आपूर्ति करने वाली कंपनियां, जिन्हें ई-कचरा ब्रोकर कहा जाता है, आमतौर पर स्वयं कचरे को रीसायकल नहीं करती हैं बल्कि इसे विकासशील देशों की कंपनियों को भेज देती हैं।