ओपेक विवाद : भारत के लिए सस्ते तेल का रास्ता खुलेगा
यूएई ने ओपेक से बाहर निकलने की घोषणा की है, जिससे भारत के लिए सस्ते तेल का अवसर मिल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ेगी और कीमतों में कमी आएगी। यूएई का यह कदम भारत के साथ उसके संबंधों को मजबूत कर सकता है।

नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। प्रमुख तेल निर्यातक संगठन ओपेक से बाहर निकलने का यूएई का ऐलान भारत के लिए अच्छी खबर है। यह फैसला लंबी अवधि में भारत के लिए सस्ते तेल का बड़ा अवसर पैदा कर सकता है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ने से कीमतों में कमी आने की संभावना बढ़ेगी। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ मानते है कि यूएई अब अपनी पूरी क्षमता के साथ कच्चे तेल का उत्पादन कर सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी और कीमतों में कमी आएगी। दरअसल, ओपेक अपने सदस्य देशों के साथ मिलकर कच्चे तेल उत्पादन का दैनिक सीमा (कोटा) तय करता है, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति को नियंत्रित कर कीमतों को स्थिर रख सके।
ओपेक देशों के पास संयुक्त रूप से दुनिया का 80 फीसदी कच्चे तेल का भंडार है। ओपेक देश मिलकर वैश्विक तेल उत्पादन का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा उत्पादित करते हैं। ओपेक देश तेल का उत्पादन बढ़ाते या कम करते है, तो इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर पड़ता है।कुछ समय के लिए अस्थिरता संभवओएनजीसी के पूर्व चेयरमैन आरएस शर्मा के अनुसार, यूएई के ओपेक छोड़ने से कुछ वक्त के लिए कच्चे तेल के बाजार में अस्थिरता दिख सकती है। क्योंकि, पश्चिम एशिया संकट की वजह से तेल की आपूर्ति बाधित है। लेकिन यूएई द्वारा कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने से बाजार में स्थिरता आने की उम्मीद है। इसका सीधा लंबी अवधि में भारत को मिल सकता है।भारत के लिए इसके मायने1. यूएई बड़ा साझेदारविशेषज्ञों का कहना है कि यूएई, भारत का पुराना और भरोसेमंद मित्र रहा है। वह भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। ओपेक से हटने के बाद यूएई उत्पादन बढ़ाने के लिए स्वतंत्र होगा और यह कदम दोनों देशों के रिश्तों को और मजूबत कर सकता है।2. रियायती दर पर समझौता संभवभारत सीधे यूएई के साथ दीर्घकालिक और रियायती दरों पर तेल समझौते कर सकता है। इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।3. हॉर्मुज पर कम निर्भरतायूएई के पास हबशान फुजैरा पाइपलाइन है, जो हॉर्मुज जलमार्ग से बाहर है, इसके जरिए भारत को तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित हो सकती है। इससे भारत की इस जलमार्ग पर निर्भरता भी कम हो सकेगी।4. आयात बिल घटेगाभारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। कच्चा तेल 5 से 10 डॉलर प्रति बैरल भी सस्ता होता है, तो भारत का आयात बिल घटेगा।क्या है हबशान पाइप लाइनहबशान फुजैरा तेल पाइपलाइन यूएई की रणनीतिक पाइप लाइन है। करीब 380 किलोमीटर लंबी यह पाइपलाइन स्ट्रेट आफ हॉर्मूज को पार करते हुए सीधे ओमन की खाड़ी में बंदरगाह तक पहुंचती है।000000000यूएई ने तेल उत्पादन बढ़ाने के लिए ओपेक और ओपेक छोड़ादरअसल, यूएई ने अपनी तेल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया है। लेकिन, वह ओपेक के लगाए गए उत्पादन में कटौती के प्रतिबंध के कारण अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहा है। इससे उसकी राजस्व क्षमता घट रही है, जो वह ज्यादा तेल बेचकर बढ़ाने की कोशिश में था। आंकड़ों के अनुसार, यूएई लगभग 2.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल का उत्पादन करता है। हालांकि, होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से उसकी उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है।यूएई की वर्तमान क्षमता 4.85 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक है, लेकिन उसका लक्ष्य 2027 तक 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंचने का है।यूएई और सऊदी अरब में मतभेदवियना स्थित तेल गठबंधन ओपेक पर सऊदी अरब का वर्चस्व है। सऊदी अरब ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए ओपेक देशों से उत्पादन कम करने की नीति को मंजूरी दिला दी। इसके अलावा सऊदी अरब और यूएई के बीच आर्थिक मुद्दों और क्षेत्रीय राजनीति, विशेष रूप से लाल सागर क्षेत्र को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है। दोनों देश 2015 में यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ने के लिए एक गठबंधन में शामिल हुए थे। हालांकि, दिसंबर के अंत में यह गठबंधन आपसी आरोपों के बीच टूट गया।अमेरिका के लिए बड़ी रणनीतिक जीतयूएई का ओपेक से बाहर निकलना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी रणनीतिक जीत का है। राष्ट्रपति ट्रंप लंबे समय से ओपेक पर तेल की कीमतें बढ़ाकर दुनिया भर के देशों का आर्थिक शोषण करने का आरोप लगाते रहे हैं। उन्होंने खाड़ी देशों के लिए अमेरिकी सैन्य समर्थन को भी सीधे तौर पर तेल की कीमतों से जोड़ दिया था। ट्रंप का स्पष्ट कहना था कि एक तरफ अमेरिका ओपेक सदस्यों की रक्षा करता है, वहीं दूसरी तरफ ये देश तेल की ऊंची कीमतें थोपकर अमेरिका और दुनिया का फायदा उठाते हैं।ओपेक और ओपेक प्लस क्या हैओपेक को दुनिया का सबसे ताकतवर तेल संगठन माना जाता है। 1960 में बने इस संगठन का मकसद ही था कि दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देश मिलकर तय करें कि कितना तेल निकालना है, ताकि कीमतें नियंत्रण में रहें। सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत और यूएई इस संगठन को नियंत्रित करने वाले प्रमुख देश रहे हैं। वर्तमान में इस संगठन के अंदर सऊदी अरब, इराक, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), लीबिया, इंडोनेशिया, कुवैत, नाइजीरिया, वेनेजुएला शामिल हैं। वहीं, ओपेक प्लस देशों में इन 12 सदस्यों के अलावा 10 और देश हैं, जिनमें रूस, अजरबैजान, बहरीन, ब्रुनेई, कजाकिस्तान, मलेशिया, मैक्सिको, ओमान और दक्षिण सूडान शामिल हैं।समूह को लग सकता है झटकायह फैसला ऐसे वक्त आया है, जब ईरान युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में ऐतिहासिक गिरावट देखी जा रही है और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई जैसे लंबे समय से सदस्य देश के बाहर होने से ओपेक के भीतर असंतुलन और मतभेद बढ़ सकते हैं। इससे उत्पादन कोटा और रणनीति पर समूह की एकजुटता कमजोर हो सकती है। यह फैसला सऊदी अरब के लिए भी अहम है।इसका क्या असर होगाविशेषज्ञों का कहना है कि ओपेक से बाहर होने के बाद यूएई को अपने तेल उत्पादन को नियंत्रित करने वाले कोटा का पालन नहीं करना पड़ेगा। यूएई धीरे-धीरे अपने तेल उत्पादन में बढ़ोतरी कर सकता है। इससे तेल बाजार में कुछ अस्थिरता आ सकती है क्योंकि ओपेक की आपूर्ति को प्रबंधित करने की क्षमता कमजोर हो सकती है। अनुमान है कि ओपेक छोड़ने से यूएई को सालाना 50 अरब डॉलर से अधिक का अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है।
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