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पूजा स्थल कानून पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट

उच्चतम न्यायालय 1991 के कानून के खिलाफ जनहित याचिका पर हुआ सहमत सीजेआई की पीठ

पूजा स्थल कानून पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट
Newswrapहिन्दुस्तान टीम,नई दिल्लीSat, 06 Aug 2022 03:20 AM
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नई दिल्ली, एजेंसी

उच्चतम न्यायालय शुक्रवार को 1991 के एक कानून के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर 9 सितंबर को सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया। इस कानून में किसी पूजा स्थल की 15 अगस्त, 1947 की स्थिति में बदलाव या किसी पूजा स्थल को पुन: प्राप्त करने के लिए मुकदमा दर्ज कराने पर रोक है।

मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी की उन दलीलों पर संज्ञान लिया, जिनमें कहा गया है कि उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम- 1991 के कुछ प्रावधानों के खिलाफ याचिका को कॉज लिस्ट (मुकदमे की सूची) से छह बार हटाया गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने न्यायमूर्ति रमना, न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ को बताया, ‘अब इसे 9 सितंबर को सूचीबद्ध किए जाने की संभावना है। कृपया निर्देश दें कि इसे सूची से हटाया नहीं जाए। उच्चतम न्यायालय ने वकील एवं भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय द्वारा इस मुद्दे पर दाखिल एक जनहित याचिका पर पिछले वर्ष 12 मार्च को केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। इस वर्ष 29 जुलाई को न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने इस अधिनियम के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती देने वाले छह याचिकाकर्ताओं को एक लंबित मामले में हस्तक्षेप याचिका दाखिल करने को कहा था।

उपाध्याय ने अपनी याचिका में आरोप लगाया गया है कि 1991 के कानून में ‘कट्टरपंथी-बर्बर हमलावरों और कानून तोड़ने वालों द्वारा किए गए अतिक्रमण के खिलाफ पूजा स्थलों या तीर्थस्थलों के चरित्र को बनाए रखने के लिए 15 अगस्त, 1947 की समयसीमा ‘मनमानी और तर्कहीन है।

नई दलीलें महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मथुरा और काशी में धार्मिक स्थलों को फिर से प्राप्त करने के लिए कुछ हिंदू समूहों द्वारा ऐसी मांग की जा रही है। लेकिन 1991 के कानून के तहत इस पर रोक है। याचिका में दावा किया गया है कि ये प्रावधान न केवल समानता और जीवन के अधिकार का उल्लंघन करते हैं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करते हैं, जो संविधान की प्रस्तावना और मूल संरचना का एक अभिन्न अंग है।

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