महिला के साथ लिव इन में रहने वाले युवक पर उत्पीड़न का मुकदमा चल सकता है या नहीं, तय करेगा सुप्रीम
प्रभात कुमार नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘वह यह तय करेगा

प्रभात कुमार नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘वह यह तय करेगा कि क्या किसी महिला के साथ लिव इन रिलेशनशिप या विवाह की प्रकृति वाले रिश्ते में रहने वाले व्यक्ति पर उत्पीड़न के आरोप में मुकदमा चलाया जा सकता है या नहीं?’ शीर्ष अदालत के समक्ष कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण कानूनी सवाल सामने आया है। उच्च न्यायालय ने एक महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप/ विवाह के प्रकृति जैसे रिश्ते में रहने वाले युवक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए जो कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 85 के समान है, के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी दी है।
जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा है कि ‘इस याचिका में महत्वपूर्ण कानूनी सवाल जुड़ा है, ऐसे में इस पर विस्तार से विचार करने की जरूरत है। पीठ ने कहा है कि यह बेहद मंहत्वपूर्ण कानूनी सवाल है कि ‘क्या कोई व्यक्ति, जो किसी महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप/शादी जैसे रिश्ते में है, उस पर आईपीसी की धारा 498ए या भारतीय न्याय संहिता बीएनएस, 2023 में उससे मिलते-जुलते प्रावधान के तहत अपराध करने के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है?’ आईपीसी की धारा 498ए पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा विवाहित महिला के साथ किए गए उत्पीड़न दंडनीय अपराध बनाती है। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता युवक और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ उत्पीड़न के आरोप में शुरू की गई मुकदमा की अदालती कार्यवाही पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने अब इस मामले में केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय को भी पक्षकार बना दिया और दो सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा है। शीर्ष अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से मामले में केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में अदालत का मदद करने का आग्रह किया है। शीर्ष अदालत ने मामले में अदालत की सहायता के लिए अधिवक्ता नीना आर नरीमन को न्याय मित्र नियुक्त करते हुए, उनसे मामले की अगली सुनवाई से पहले अपना लिखित जवाब/सुझाव दाखिल करने को कहा है। इसके साथ ही, पीठ ने कर्नाटक सरकार, संबंधित थाना प्रभारी को भी नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है। साथ ही उस महिला को भी नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने को कहा है, जिसकी शिकायत पर युवक और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। पीठ ने मामले की सुनवाई 9 मार्च तय करते हुए, सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्री को मामले से जुड़े सभी दस्तावेज न्याय मित्र व अधिवक्ता नरीमन और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भाटी को मुहैया कराने का आदेश दिया है। यह है मामला इस मामले में शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया कि उसके साथ शादी जैसे रिश्ते में रहने वाले युवक और उसके परिवार वालों ने दहेज के लिए उत्पीड़न किया और उसे जलाने का भी प्रयास किया। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि युवक पहले से ही शादीशुदा था। इस मामले में, उच्च न्यायालय ने युवक को राहत देने से इनकार कर दिया था। उच्च न्यायालय ने युवक की उन दलीलों को ठुकरा दिया था, जिसमें कहा गया था कि जब शुरू से ही विवाह ‘शून्य’ यानी है तो आईपीसी की धारा धारा 498ए के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। ‘पति’ की संकीर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती- उच्च न्यायालय उच्च न्यायालय ने इस मामले में युवक के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए के तहत मुकदमा चलाने को सही ठहराते हुए कहा कि इसमें (धारा 498ए) प्रयुक्त ‘पति’ शब्द की संकीर्ण या तकनीकी व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे जैसे रिश्ते को बाहर कर दिया जाए। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि आईपीसी की धारा 498ए के तहत लाए गए प्रावधान का मकसद महिलाओं को क्रूरता से बचाना है, ऐसे में महज इस आधार पर महिला को संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता कि विवाह शून्य या अवैध था या वे लिव-इन में रह रहे थे।

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