गलतफहमी में न रहे, आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वालों की तय करेंगे जिम्मेदारी- सुप्रीम कोर्ट
प्रभात कुमार नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि ‘हमारी पिछली टिप्पणियों को

प्रभात कुमार नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि ‘हमारी पिछली टिप्पणियों को लेकर गलतफहमी में न रहें, हम इस मामले को लेकर गंभीर हैं और अपने फैसले में आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वालों की जवाबदेही तय करेंगे।’ शीर्ष अदालत ने कहा कि पिछली सुनवाई पर !हमने जो आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वालों की जिम्मेदारी तय करने के बारे में टिप्पणी की थी, वह कोई व्यंग्य नहीं था बल्कि हम इसको लेकर गंभीर हैं। जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया की पीठ ने यह टिप्पणी तब की, जब अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि जब अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि अदालत द्वारा पिछली सुनवाई कर की गई टिप्पणियां, जो शायद व्यंग्य में की गई थीं, के कारण दुर्भाग्यपूर्ण नतीजे हुए हैं, जिसमें कुत्ते को खाना खिलाने वालों पर हमले भी शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि ‘कभी-कभी, अदालत की टिप्पणियों से दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम सामने आते हैं। उन्होंने अदालत की उस टिप्पणी का जिक्र किया, जिसमें कहा गया है कि कुत्ते के काटने के लिए आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। शायद यह व्यंग्य था लेकिन इसकी गलत मीडिया में इसकी गलत रिपोर्टिंग हुई। उन्होंने कहा कि इन टिप्पणियों का सहारा लेकर खाना खिलाने वालों को पीटा जा रहा है, परेशान किया जा रहा है।’ इस पर जस्टिस नाथ ने कहा कि ‘नहीं, हमने यह व्यंग्य में नहीं कहा था, हमने यह बहुत गंभीरता से कहा था। साथ ही कहा कि हमें नहीं पता कि हम क्या करेंगे, लेकिन हम गंभीर थे।’ जब अधिवक्ता भूषण ने पीठ से कहा कि अदालत की टिप्पणी को गलत समझा जाता है तो जस्टिस मेहता ने कहा कि ‘कोई बात नहीं, मामले में अवास्तविक तर्क दिए जा रहे हैं।’ इससे पहले, अधिवक्ता भूषण ने मंगलवार को बहस की शुरुआत करते हुए शीर्ष अदालत से कहा कि ‘देश में आवारा कुत्तों की नसबंदी को एक समान तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हालांकि नसबंदी से आवारा कुत्तों में दिखने वाली आक्रामकता कम होती है, लेकिन इसे पारदर्शी तरीके से लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने पीठ से इस मुद्दे पर विशेषज्ञ समिति बनाने का आग्रह करते हुए कहा कि ‘कुत्तों के नसबंदी की यह प्रणाली अधिकांश शहरों में काम नहीं कर पाई है, लेकिन लखनऊ और गोवा जैसे कुछ शहरों में यह प्रभावी रही है। उन्होंने कहा कि इसे पारदर्शी और लोगों को जवाबदेह बनाकर बंध्याकरण को प्रभावी बनाया जा सकता है। उन्होंने पीठ से कहा कि एक ऐसी प्रणाली होनी चाहिए, जहां लोग उन आवारा कुत्तों की रिपोर्ट कर सकें जो नसबंदी वाले नहीं लगते हैं। इसे किसी वेबसाइट पर रिकॉर्ड या रिपोर्ट किया जाना चाहिए। ऐसे नामित अधिकारी होने चाहिए जिनकी जिम्मेदारी बिना नसबंदी वाले आवारा कुत्तों के बारे में शिकायत पर कार्रवाई करना हो। इस पर जस्टिस मेहता ने कहा कि ‘हम कुत्तों से खुद सर्टिफिकेट ले जाने के लिए क्यों नहीं कह सकते? इस पर भूषण ने कहा कि कोर्ट की ऐसी टिप्पणियों के दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम हो सकते हैं। अब इस मामले की सुनवाई 28 जनवरी को होगी और उस दिन अलग-अलग राज्यों और मामले में नियुक्त न्याय मित्र का पक्ष सुनेगी। आवारा कुत्तों के मुद्द पर पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को सुप्रीम कोर्ट की फटकार आवारा कुत्तों की समस्याओं से जुड़े मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की आलोचना करने वाली टिप्पणियों के लिए शीर्ष अदालत ने मंगलवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि उन्होंने अदालत की अवमानना की है। इस मुद्दे पर पूर्व केंद्रीय मंत्री गांधी के बयान पर तीखी नाराजगी जाहिर करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘मुंबई हमलों के दोषी अजमल कसाब ने भी अदालत की अवमानना नहीं की, लेकिन आपने (मेनका गांधी) की।’ जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन वी अंजारिया की पीठ ने कहा कि ‘हालांकि कोर्ट की उदारता के कारण हम पूर्व केंद्रीय मंत्री गांधी के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं कर रहे हैं। पीठ ने कहा कि पूर्व मंत्री ने बिना सोचे-समझे सभी के खिलाफ हर तरह की टिप्पणियां की हैं।’ पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन से सवाल करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘कुछ देर पहले आप कोर्ट से कह रहे थे कि हमें सावधान रहना चाहिए। क्या आपने पता लगाया कि आपकी मुवक्किल ने किस तरह की टिप्पणियां कर रही हैं? क्या आपने उनका पॉडकास्ट सुना है? क्या आपने उनकी बॉडी लैंग्वेज देखी है? वह क्या कहती हैं और कैसे कहती हैं। आपके मुवक्किल ने अदालत की अवमानना की है। हम अदालत की उदारता के कारण संज्ञान नहीं ले रहे हैं। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता रामचंद्रन ने पीठ से कहा कि ‘यह अवमानना का मामला नहीं था और राजनेता अलग-अलग बयान देते रहते हैं। उन्होंने कहा कि वह 2008 के मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के दोषी अजमल कसाब की ओर से भी पेश हुए थे और इस मामले में वह सिर्फ अपने मुवक्किल की दलील पेश कर रहे थे। वरिष्ठ अधिवक्ता रामचंद्रन सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी थे, जिन्होंने मौत की सजा के खिलाफ अपनी अपील में कसाब का प्रतिनिधित्व किया था। इस पर जस्टिस नाथ ने कहा कि ‘अजमल कसाब ने कोर्ट की अवमानना नहीं की, लेकिन आपकी क्लाइंट (गांधी) ने की है। वरिष्ठ अधिवक्ता रामचंद्रन ने कहा कि सार्वजनिक टिप्पणियों के मामले में वकील और जज अलग-अलग स्तर पर होंगे और गांधी द्वारा दायर हस्तक्षेप याचिका पर बहस करने की अनुमति मांगी। पशु कल्याण में गांधी का क्या योगदान रहा है- जस्टिस मेहतरा जस्टिस संदीप मेहता ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन से कहा कि ‘चूंकि आपके मुवक्किल केंद्रीय मंत्री रही हैं और एक जानी-मानी पशु अधिकार कार्यकर्ता हैं और लंबे समय से सांसद रही हैं। हमें बताएं कि आपका (गांधी का) हस्तक्षेप अर्जी उस बजटीय आवंटन पर चुप क्यों है जो उनकी वजह से किया गया है। इन समस्याओं में आपके मुवक्किल का क्या योगदान रहा है’ इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता रामचंद्रन ने कहा कि वह इस सवाल का जवाब मौखिक रूप से नहीं दे सकते, लेकिन बजटीय आवंटन एक नीतिगत फैसला है। पूर्व केंद्रीय मंत्री गांधी ने पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की आलोचना करते हुए उन्हें अव्यावहारिक बताया था और दया दिखाने की अपील की थी। भूखा रहने पर कुत्तों में बढ़ती है आक्रामकता एक अन्य अधिवक्ता ने शीर्ष अदालत को बताया कि ऐसे वैज्ञानिक अध्ययन हैं जो दिखाते हैं कि आवारा कुत्तों को खाना खिलाने से उनके व्यवहार को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि अगर आप खाना खिलाना बंद कर देते हैं, तो घूमने वाले कुत्तों की संख्या में 742 फीसदी की वृद्धि होती है, जिससे कुत्तों की लड़ाई, आक्रामकता आदि होती है। उन्होंने कहा कि खाना खिलाने से कुत्ते कचरे में खाना ढूंढना कम कर देता है। प्रतिस्पर्धा कम होती है। तनाव कम होता है। संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है। इससे जल्दी पता लगाने में मदद मिलती है। यह कुत्तों के व्यवहार की भविष्यवाणी को बढ़ाता है... खाना खिलाने वाले लोग एक सार्वजनिक कार्य करते हैं। भ्रष्टाचार है, अधिकारियों में आलस है। खाना खिलाने वाले अपनी जेब से बांध्याकरण करवाते हैं। एक अन्य अधिवक्ता किशोर शिंदे ने सुझाव दिया कि अगर आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएं होती हैं, तो स्थानीय अधिकारियों पर मेडिकल लापरवाही और टॉर्टियस लायबिलिटी लगाई जा सकती है। बेहतर रेबीज नियंत्रण प्रणाली की जरूरत- अधिवक्ता ऐश्वर्या सिंह ने शीर्ष अदालत से बेहतर रेबीज नियंत्रण प्रणाली बनाने की मांग की। उन्होंने कहा कि सिर्फ 54 फीसदी केंद्रों पर ही घाव धोने की सुविधा थी। जबकि 84 फीसदी केंद्रों में वैक्सीन खत्म हो गई थी। उन्होंने कहा कि दो तरह के वैक्सीनेशन होते हैं। पहला पीईपी (काटने के बाद) और दूसरा पीआरईपी (काटने से पहले)। पीआरईपी पीड़ित के सामने एक शील्ड लगाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत के संदर्भ में पीआईपी की सिफारिश की है। जन स्वास्थ्य देखभाल उपाय के तौर पर पीआरईपी को लागू करने में भारत का नाकाम रहना एक गंभीर चूक है। उन्होंने उन हालातों पर भी संक्षेप में बात की जिनकी वजह से सुप्रीम कोर्ट में यह स्वतः संज्ञान मामला शुरू हुआ। उन्होंने कहा कि ‘बच्चे की दुखद मौत, जिससे यह मामला शुरू हुआ, निस्संदेह दिल दहला देने वाली है। हालांकि, मीडिया कवरेज में यह बात छूट गई है कि मौत का कारण वायरस था। अधिवक्ता ने कहा कि दिमागी बुखार के चलते बच्चे की मौत हुई थी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने उसे बच्चे की मौत का जिक्र न करने की चेतावनी दी। पीठ ने कहा कि हम आपको ऐसा करने से मना करते हैं। उस मौत के बारे में एक भी शब्द नहीं। एक भी शब्द नहीं। अधिवक्ता सिंह ने कहा कि वह बच्चा राज्य की संस्थागत नाकामी का शिकार हुआ। पीठ ने उन्हें दोबारा से बच्चे की मौत का जिक्र नहीं करने को कहा।

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