सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला निरस्त किया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बैंकों द्वारा खातों को 'धोखाधड़ी' के रूप में वर्गीकृत करने से पहले उधारकर्ता को व्यक्तिगत सुनवाई का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि दस्तावेजों और ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है और उधारकर्ता को ऑडिट रिपोर्ट की प्रति दी जानी चाहिए ताकि वह अपनी आपत्ति दर्ज करा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि बैंकों द्वारा खातों को 'धोखाधड़ी' के रूप में वर्गीकृत करने से पहले उधारकर्ता को व्यक्तिगत सुनवाई का अधिकार नहीं हैं। न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें उधारकर्ता को धोखाधड़ी वाला खाता घोषित करने से पहले व्यक्तिगत सुनवाई देने का बैंक को निर्देश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने आरबीआई के धोखाधड़ी जोखिम प्रबंधन से जुड़े नियमों की व्याख्या करते हुए कहा कि ‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांतों का पालन करने के लिए कारण बताओ नोटिस देना, जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराना, उधारकर्ता के जवाब पर विचार करना और कारण के साथ आदेश पारित करना पर्याप्त है।सुप्रीम
कोर्ट ने कहा कि यदि बैंक किसी खाते को धोखाधड़ी घोषित करने में ऑडिट रिपोर्ट (फॉरेंसिक ऑडिट समेत) पर निर्भर करते हैं, तो उसकी प्रति उधारकर्ता को देनी होगी ताकि वह उस पर अपनी आपत्ति या जवाब दे सके। इसके साथ ही पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में निर्णय मुख्य रूप से दस्तावेजी साक्ष्यों- जैसे वित्तीय रिकॉर्ड, लेन-देन विवरण और ऑडिट रिपोर्ट पर आधारित होता है इसलिए हर मामले में मौखिक सुनवाई जरूरी नहीं होती।
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