‘आपराधिक मामले में बरी, तो अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब सैन्य बल आपराधिक कार्यवाही का विकल्प चुनते हैं, तो बरी होने पर अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए, वायु सेना के पूर्व अधिकारी आर. सूद की सेवा से जुड़े लाभ बहाल किए गए। कोर्ट ने कहा कि बरी होने के बाद मामला वहीं समाप्त होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि एक बार जब सैन्य बल अपने किसी अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही के बजाय आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने का विकल्प चुनते हैं, तो उस मामले में बरी होने पर उसके (अधिकारी) के खिलाफ अनुशासनात्मक नहीं की जा सकती। शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ वायु सेना के एक पूर्व अधिकारी की अपील स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। जस्टिस दीपांकर दत्ता और के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए अपीलकर्ता व वायु सेना के पूर्व स्क्वाड्रन लीडर आर. सूद का सम्मान बहाल कर दिया। उन्हें लगभग तीन दशकों के बाद सेवा से जुड़े लाभ भी दिए गए।
आपराधिक कार्यवाही में बरी किए जाने के बाद भी सूद को अनुशासनात्मक कार्यवाही का सामना करना पड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि वायु सेना ने जब कथित अपराध की सुनवाई आपराधिक अदालत में करवाने का विकल्प चुन लिया था, तो कानूनी प्रावधानों पर विचार करने से हम पाते हैं कि वे (वायु सेना) दोबारा न तो कोर्ट मार्शल का सहारा ले सकते हैं और न ही कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकते हैं। शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि एक बार जब अपीलकर्ता को आपराधिक अदालत द्वारा बरी कर दिया जाता है, तो उस मामले का वहीं अंत हो जाना चाहिए।
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