
लोक अभियोजक का काम सिर्फ आरोपी को सजा दिलाना नहीं, न्याय के हित में काम करना है- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लोक अभियोजक अदालत का अधिकारी होता है और उसका कर्तव्य न्याय के हित में काम करना है। कोर्ट ने तीन आरोपियों की सजा रद्द करते हुए कहा कि लोक अभियोजक को सिर्फ आरोपी को सजा दिलाने के उद्देश्य से नहीं बल्कि निष्पक्षता के साथ काम करना चाहिए।
नई दिल्ली। विशेष संवाददाता सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि लोक अभियोजक (सरकारी वकील) अदालत का एक अधिकारी होता है, जिसका कर्तव्य न्याय के हित में काम करना है, न कि सिर्फ आरोपी को सजा दिलाना। शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि लोक अभियोजक आरोपी को सजा दिलाने के मकसद से न्याय के हित में अदालत के प्रति अपनी कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ सकता है। जस्टिस संजय करोल और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हत्या के मामले में 3 आरोपियों को दोषी ठहराकर दी गई सजा को रद्द करते हुए यह फैसला दिया है। पीठ ने लोक अभियोजक के बर्ताव पर चिंता भी जाहिर की और कहा कि उनसे उम्मीद की जाती है कि वे आजादी से काम करें, न कि हर बार सिर्फ बचाव पक्ष के वकील की तरह काम करें ताकि हर कीमत पर आरोपी को सजा मिल सके।

शीर्ष अदालत ने पटना उच्च न्यायालय के सितंबर, 2024 के फैसले को चुनौती देने वाली अपील का निपटारा करते हुए यह फैसला दिया है। आरोपियों ने पटना उच्च न्यायालय के फैसले के चुनौती देते हुए आरोप लगाया था कि इस मामले में अपराध प्रक्रिया संहित (सीआरपीसी) की धरा 313 के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया है। इस प्रावधान के तहत अदालत में आरोपी का बयान दर्ज करने के साथ ही, उससे जिरह करने का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद सीआरपीसी की धारा 313 के प्रावधानों का पालन नहीं किया जाना एक गंभीर प्रक्रिया की कमी है जिसने ट्रायल की निष्पक्षता को कमजोर किया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आरोपियों को दी गई सजा को रद्द करने के साथ ही मामले को दोबारा से ट्रायल कोर्ट भेज दिया है ताकि सीआरपीसी की धारा 313 तहत बयान रिकॉर्ड करने के स्टेज से कार्रवाई फिर से शुरू की जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निष्पक्ष ट्रायल की एक जरूरी शर्त यह है कि आरोपी लोगों को उनके खिलाफ केस और अभियोजन के दावों को खारिज करने का पूरा मौका मिलना चाहिए। पीठ ने कहा है कि यह पूरा मौका कई तरह का हो सकता है, चाहे वह वकील के जरिए सही रिप्रेजेंटेशन हो या गवाहों को बुलाकर केस का अपना पक्ष रखने का मौका हो या अपने खिलाफ हर आरोप का जवाब खुद अपने शब्दों में देने का मौका हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपियों के बयानों को देखने के बाद, हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि हालात बहुत खराब दिखते हैं क्योंकि संबंधित कोर्ट कानून के मूलभूत नियमों का पालन करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। पीठ ने कहा है कि मामले में तीनों लोगों द्वारा दिए गए बयान को एक-दूसरे की कार्बन कॉपी बताया है। साथ ही कहा है कि ऐसे बयान कैसे ट्रायल जज के सामने टिक पाते हैं, यह हम समझ नहीं पा रहे हैं।

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