‘नीट पीजी कटऑफ कम होने से गुणवत्ता पर असर नहीं’

हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नीट-पीजी 2025-26 की कटऑफ पर्सेंटाइल कम करने से डॉक्टरों की गुणवत्ता पर असर नहीं पड़ेगा। जस्टिस नरसिम्हा ने इस बात की जांच करने का आश्वासन दिया है कि कमी से चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी या नहीं। सुनवाई 24 मार्च तक स्थगित कर दी गई।

‘नीट पीजी कटऑफ कम होने से गुणवत्ता पर असर नहीं’

केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नीट-पीजी 2025-26 की कटऑफ पर्सेंटाइल कम किए जाने से डॉक्टरों की गुणवत्ता प्रभावित नहीं होगी क्योंकि वे उम्मीदवार पहले से ही एमबीबीएस डिग्री प्राप्त कर चुके हैं। केंद्र ने राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड ऑफ मेडिकल साइंसेंज (एनबीईएमएस) द्वारा पर्सेंटाइल कम किए जाने का बचाव करते हुए केंद्र सरकार ने कहा कि यह फैसला खाली सीटों को भरने के लिए लिया गया है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने केंद्र सरकार की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि वह इस बात की जांच करेगा कि नीट-पीजी 2025-26 के लिए क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल में भारी कमी से पोस्ट ग्रेजुएट चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा या नहीं।

जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि हालांकि केंद्र का यह कहना सही है कि नीट पीजी एमबीबीएस में दाखिला नहीं है और उम्मीदवार पहले से ही डॉक्टर हैं, फिर भी यह अदालत पर्सेंटाइल कम करने के असर पर विचार करेगी। उन्होंने कहा कि हमें सबसे अधिक चिंता शिक्षा की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ने की है। पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि आपको हमें यह समझाना होगा कि कटऑफ में इतनी बड़ी कमी यानी इसे लगभग शून्य या खत्म कर देना से चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर असर नहीं पड़ेगा। इसके साथ ही पीठ ने मामले की सुनवाई 24 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी। पीठ ने एनबीईएमएस द्वारा खाली पड़े करीब 18 हजार सीटों को भरने के लिए नीट पीजी की पर्सेंटाइल में भारी कमी किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। खाली सीटों के मद्देनजर लिया गया है फैसला अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने केंद्र सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे का जिक्र करते हुए कहा कि यह फैसला बड़े पैमाने पर खाली सीटों के मद्देनजर लिया गया है। भाटी ने पीठ से कहा कि यह परीक्षा (नीट पीजी) न्यूनतम क्लीनिकल काबिलियत को प्रमाणित नहीं करती है क्योंकि दाखिला लेने वाले उम्मीदवार पहले ही एमबीबीएस की डिग्री ले चुके होते हैं और नीट पीजी का मकसद सीटों की कमी के चलते उम्मीदवारों की तुलना करना और उन्हें छांटना है। सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में फीस का अंतर दूसरी तरफ पर्सेंटाइल कम करने के खिलाफ याचिका दाखिल करने वालों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पीठ के समक्ष फीस में अंतर का मुद्दा उठाया। उन्होंने पीठ से कहा कि सरकारी संस्थानों में फीस ₹9,000 से ₹27,000 के बीच है, जबकि निजी मेडिकल कॉलेजों में यह फीस 95 लाख से ₹1.5 करोड़ के बीच है। फीस तय करने पर विचार किया जाए वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि भले ही 50 परसेंटाइल तक 1.3 लाख उम्मीदवार उपलब्ध हैं, लेकिन वे निजी मेडिकल कॉलेज में दाखिल नहीं ले सकते क्योंकि फीस बहुत अधिक है। उन्होंने यह भी कहा कि नियामक को फीस की ‌कुछ सीमा तय करने पर विचार करना चाहिए। निजी कॉलेज नियमों का खुला उल्लंघन कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने शीर्ष अदालत से कहा कि फीस तय करने के नियम राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने बनाए हैं और इसके तहत निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस उस राज्य के सरकारी कॉलेज से 50 फीसदी से ‌अधिक नहीं हो सकती। इस पर याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पीठ से कहा कि यदि ऐसा है, निजी कॉलेजों द्वारा नियमों का खुला उल्लंघन किया जा रहा है।

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