बंगाल में अफसरों के तबादले संबंधी याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में चुनाव के मद्देनजर प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के तबादले के खिलाफ याचिका खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह कोई नई बात नहीं है। उन्होंने चुनावों में अधिकारियों के तबादले पर राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच भरोसे की कमी को रेखांकित किया।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भारत के निर्वाचन आयोग (ईसीआई) द्वारा पश्चिम बंगाल में चुनाव के मद्देनजर प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के तबादले किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि चुनाव के दौरान अधिकारियों के तबादले कोई नई बात नहीं है बल्कि यह पिछले 20 से 25 सालों से लगातार चलन में है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम. पंचोली की पीठ ने एक बार फिर पश्चिम बंगाल सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच भरोसे की कमी को रेखांकित किया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच भरोसे की बेहद कमी है और यही वजह है कि मतदाता सूची में एसआईआर के काम में सुप्रीम कोर्ट को न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त करना पड़ा।
उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग को राज्य सरकार के अधिकारियों पर भरोसा नहीं है और राज्य को उन अधिकारियों पर भरोसा नहीं है जिन्हें वे (निर्वाचन आयोग) लेकर आए हैं। मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यह देश का दुर्भाग्य है कि अखिल भारतीय सेवाओं को बनाने का मकसद पूरा नहीं हो पा रहा है।अधिसूचना के बाद 1100 अधिकारियों का तबादला किया गयाकलकत्ता हाईकोर्ट ने 31 मार्च को निर्वाचन आयोग द्वारा राज्य में अधिकारियों के तबादले को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता अर्का कुमार नाग ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की थी। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी राज्य के मुख्य सचिव तक का तबादला कर दिया गया। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनावों की अधिसूचना जारी होने के बाद पश्चिम बंगाल में लगभग 1,100 अधिकारियों का तबादला रातों-रात किया गया।ऐसा कोई पहली बार तो किया नहीं गया : मुख्य न्यायाधीशमुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह कोई ऐसी बात नहीं है जो पहली बार हुई हो, या जो सिर्फ इसी राज्य में हुई हो। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि जिन अधिकारियों का तबादला या पोस्टिंग की गई, वे सभी पश्चिम बंगाल कैडर के हैं। ऐसा नहीं है कि दूसरे राज्यों के अधिकारियों को नियुक्त किया गया है। वे सभी पश्चिम बंगाल राज्य के सेवारत अधिकारी हैं। चाहे वे ‘ए’ पद पर हों या ‘बी’ पद पर, इससे क्या फर्क पड़ता है?इन बदलावों के बाद कलियाचक की घटना हुईवरिष्ठ अधिवक्ता बनर्जी ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल में मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और कई पुलिस अधीक्षकों समेत दूसरे सीनियर अधिकारियों को बदल दिया था। उन्होंने कहा कि इन बदलावों के बाद कालियाचक की घटना हुई। दूसरी जगहों पर भी कानून-व्यवस्था से जुड़ी कुछ दिक्कतें थीं और साथ ही यह भी कहा कि निगरानी रखने की शक्ति से विधायी शक्ति खत्म नहीं हो जाती।राज्य से विमर्श मामले में फैसला करेंगे : शीर्ष कोर्टवरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि हम यह नहीं कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट अधिकारियों के तबादले पर रोक लगाए, बल्कि हम इस मामले में कानून से जुड़ा एक बहुत ही अहम सवाल उठा रहे हैं कि ‘क्या निर्वाचन आयोग को अधिकारियों के तबादले से पहले राज्य सरकार से विचार विमर्श नहीं करना चाहिए था? इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि हम इस कानूनी और महत्वपूर्ण सवाल को खुला रख रहे हैं और किसी सही मामले में फैसला करेंगे।‘बंगाल चुनाव मुकदमों के लिए खुला मैदान बन गया’मुख्य न्यायाधीश ने अधिकारियों के तबादले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि चलिए, हम पश्चिम बंगाल के चुनावों को ध्यान में न रखें। राज्य के बाहर से आया कोई पर्यवेक्षक हमेशा ही सबसे अच्छा होता है। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता बनर्जी ने पूछा कि इस बार पश्चिम बंगाल के चुनावों के दौरान इतने सारे सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले मैं चुनावों में व्यस्त रहता था। अब मैं अदालतों में व्यस्त हूं। इस बार ही ऐसा क्यों? इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि पश्चिम बंगाल के चुनाव तो चुनावी मुकदमों के लिए एक खुला मैदान बन गए हैं।
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