सजा निलंबित करते समय अदालतों को सावधानी और संयम बरतना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में दो दोषियों की सजा को निलंबित करने के पटना हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सजा सुनाए जाने के बाद सजा को निलंबित करने के नियम अलग होते हैं। अपीलीय अदालत को गंभीर अपराधों में सजा को रूटीन के तौर पर निलंबित नहीं करना चाहिए।

नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि आपराधिक मामले में सजा सुनाए जाने के बाद सजा को निलंबित करने के नियम, उन नियमों से गुणात्मक रूप से अलग होते हैं जो ट्रायल से पहले जमानत पर विचार करने के चरण में लागू होते हैं। शीर्ष अदालत ने पटना हाईकोर्ट द्वारा हत्या के मामले में निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील लंबित रहने तक दो दोषियों की सजा निलंबित करने के आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की है। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2016 के हत्या के एक मामले में आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
बाद में हाईकोर्ट ने दोषियों की अपील लंबित रहने तक उनकी सजा को निलंबित करते हुए जमानत दे दी थी। जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि दोषी ठहराए जाने के बाद ‘निर्दोष होने की धारणा’ की जगह ‘दोषी होने का न्यायिक निर्धारण’ ले लेता है, और अपीलीय अदालत को अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 389 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल पूरी सावधानी और संयम के साथ करना चाहिए। धारा 389 में अपील लंबित रहने के दौरान सजा को निलंबित करने और अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा करने का प्रावधान है।सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ शिकायतकर्ता/पीड़ित परिवार की ओर से दाखिल दो अलग-अलग अपीलों पर यह फैसला दिया है। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि ‘इस बात पर जोर देना जरूरी है कि सजा सुनाए जाने के बाद सजा को निलंबित करने के नियम, उन नियमों से गुणात्मक रूप से अलग होते हैं जो ट्रायल से पहले जमानत के चरण में लागू होते हैं।’ अपने आदेश के एक फैसले का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि ‘गंभीर अपराधों में सजा को रूटीन के तौर पर निलंबित नहीं किया जाना चाहिए। अपीलीय अदालत को अपराध की प्रकृति, उसे अंजाम देने के तरीके और ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों की गंभीरता पर पूरी तरह से विचार करना चाहिए।’ पीठ ने कहा कि जहां तक मौजूदा मामले का सवाल है तो रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजों को देखने से पता चलता है कि अभियोजन पक्ष का मामला प्रत्यक्षदर्शी गवाहों पर आधारित है, जिसे ट्रायल कोर्ट ने पूरी तरह से परखा है और स्वीकार किया है। साथ ही कहा कि इन बातों पर सही नजरिए से विचार किए बिना, हाईकोर्ट ने आरोपी में से एक की सजा को निलंबित करने और उसे जमानत पर रिहा करने में गलती की।पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने जिस आधार पर फैसला सुनाया कि जानलेवा गोली किसी दूसरे सह-आरोपी ने चलाई थी, जबकि आरोपी में से एक को भारतीय दंड संहिता की धारा 34 की मदद से दोषी ठहराया गया था, वह आधार पूरी तरह से गलतफहमी पर आधारित था। पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए दोषियों को संबंधित अदालत में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है।
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