ट्रॉमा केयर अधिकार भी जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग- सुप्रीम कोर्ट

Newswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट ने 'ट्रॉमा केयर का अधिकार' को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग माना। यह देश में पहले बार ट्रॉमा केयर के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई। न्यायालय ने सभी राज्यों को दिशा-निर्देश दिए और इमरजेंसी हेल्पलाइन के एकीकरण की बात की।

ट्रॉमा केयर अधिकार भी जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग- सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। विशेष संवाददाता सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को महत्वपूर्ण फैसले में ‘ट्रॉमा केयर का अधिकार’- जिसमें चोट लगने की जगह से लेकर अस्पताल में मिलने वाले इलाज तक, जीवन बचाने की आपस में जुड़ी और समन्वित प्रक्रिया शामिल है, को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग बताया। यह पहला मौका है, देश में ट्रौमा केयर के अधिकार को मौलिक अधिकार के तौर पर मान्यता मिली।जस्टिस जेके माहेश्वरी और ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने इस मामले में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दिशा-निर्देश जारी किया है। पीठ ने गैर सरकारी संगठन सेव लाइफ फाउंडेशन की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर ‘ट्रॉमा चेन ऑफ़ सर्वाइवल’ यानी आघात से बचने की प्रक्रिया के बारे में कई दिशा-निर्देश जारी किया।

साथ ही, निर्देशों के अनुपालन में सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। पीठ ने सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को इमरजेंसी हेल्पलाइन का एकीकरण करने को कहा है। पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों सभी इमरजेंसी और एम्बुलेंस हेल्पलाइन, जिनमें 100, 101, 102, 108, 1033, 1091, और राज्य-स्तर के सभी समकक्ष नंबर शामिल हैं, का पूरी तरह से तकनीकी और परिचालन एकीकरण, एक ही राष्ट्रीय इमरजेंसी नंबर 112 में, तीन महीने के भीतर पूरा करने को कहा है। पीठ ने इन नबरों को बड़े पैमाने पर मीडिया के जरिए प्रचार अभियान भी चलाने का आदेश दिया है। इसके अलावा, पीठ ने गुड समैरिटन यानी ‌नेक मददगार शिकायत निवारण तंत्र भी बनाने का निर्देश दिया है। इसके लिए तीन माह के भीतर राज्य और जिला स्तर पर नामित नोडल अधिकारियों के साथ, काम करने लायक भौतिक और डिजिटल नेक मददगार की शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करें करने को कहा है। इसके अलावा, ट्रॉमा मामलों के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा बचाव प्रोटोकॉल को लागू करने को कहा है। इसके तहत स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के माध्यम से केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वे तीन महीने के भीतर, ट्रॉमा मामलों के लिए एक मानकीकृत चिकित्सा बचाव प्रोटोकॉल जारी करे, जो घटना स्थल से लेकर उपचार सुविधा तक, आघात से बचने की पूरी प्रक्रिया (चेन ऑफ सर्वाइवल) को नियंत्रित करेगा। इसके अलावा पीठ ने कई निर्देश जारी किया है। पीठ ने फैसले की प्रति सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को भेजने का आदेश दिया है।

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