
हेट क्राइम की धारा लगाएं या हम आदेश देंगे : सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा में एक मुस्लिम धर्मगुरु पर हुए हमले के मामले में हेट क्राइम से जुड़ी धाराओं को न लगाने पर उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर में आवश्यक धाराएं जोड़ने का निर्देश दिया। मामले की उचित जांच और कार्रवाई की मांग की गई है।
नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। नोएडा में मुस्लिम धर्मगुरु पर हुए हमले के मामले में दर्ज प्राथमिकी में पुलिस द्वारा हेट क्राइम से जुड़ी धाराएं नहीं लगाए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कड़ा रुख अपनाया। शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया कि 2021 में दर्ज एफआईआर में भारतीय दंड संहिता की धारा 153बी और धारा 295ए जैसे प्रावधान क्यों नहीं जोड़े गए। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने लंबी सुनवाई के बाद कहा कि राज्य सरकार के पास अब केवल दो ही विकल्प हैं। या तो वह संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करे या फिर अदालत को इसके लिए आदेश पारित करना पड़ेगा।
मामले से जुड़ी पूरी जानकारी देने के लिए पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक सप्ताह का समय दिया। पीठ काजीम अहमद शेरवानी की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में शेरवानी ने कहा कि उनकी मुस्लिम पहचान के कारण एक समूह ने उन पर हमला किया। उन्होंने शीर्ष अदालत से मामले की निष्पक्ष जांच कराने और उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है, जिन्होंने उनकी शिकायत पर उचित कार्रवाई नहीं की। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में देशभर में भड़काऊ भाषण और हेट क्राइम को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर आदेश सुरक्षित रख लिया था, लेकिन इस मामले की सुनवाई लंबित रखी गई थी। जांच अधिकारी की गलती शेरवानी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने अदालत को बताया कि 2021 में उनके मुवक्किल पर हुआ हमला कोई अलग-थलग घटना नहीं थी। इस तरह की घटनाएं लगातार हो रही हैं, लेकिन अधिकारी इन पर संज्ञान लेने से बचते रहे हैं। राज्य सरकार लगातार हेट क्राइम से संबंधित आईपीसी की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार करती रही है और गंभीर अपराध होने के बावजूद मामूली धाराओं में ही मामला दर्ज किया गया। इस पर पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराजन से पूछा कि आरोपों के आधार पर पहली नजर में बनते अपराधों के तहत प्राथमिकी क्यों दर्ज नहीं की गई। जवाब में नटराजन ने कहा कि यह जांच अधिकारी की गलती थी और उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी गई है। सरकार ने क्या किया इस पर जस्टिस मेहता ने कहा कि केवल जांच शुरू करना इस सवाल का जवाब नहीं है कि अपराध क्यों नहीं दर्ज किए गए। उन्होंने पूछा कि नोटिस जारी होने के बाद सरकार ने क्या किया और क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई से सही धाराओं में मामला दर्ज न होने की समस्या हल हो जाती है। उन्होंने कहा कि जब तक प्राथमिकी दर्ज नहीं होती और आवश्यक मंजूरी नहीं ली जाती, तब तक मुकदमा आगे नहीं बढ़ सकता। पीठ ने यह भी कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196 इन अपराधों में संज्ञान लेने पर रोक लगाती है।

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