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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सभी राज्यों को ऐसे अनाथ बच्चों का सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया, जो बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत शिक्षा से वंचित हैं। न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने केंद्र से 2027 में होने वाली आगामी जनगणना में ऐसे बच्चों के आंकड़ों को शामिल करने पर विचार करने को कहा। शीर्ष अदालत देखभाल और संरक्षण की जरूरत वाले अनाथ बच्चों के लिए चिंता जताने वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने कहा कि अनाथ बच्चों के संरक्षण और देखभाल के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाएं अपर्याप्त हैं, जिन पर विचार करने की जरूरत है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्यों को उन अनाथ बच्चों का सर्वेक्षण करना होगा, जिन्हें अधिनियम के तहत पहले ही प्रवेश दिया जा चुका है। इसके साथ ही उन बच्चों का भी सर्वेक्षण करना होगा, जो अधिनियम के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार से वंचित हैं। अदालत ने कहा कि राज्यों को इस संबंध में हलफनामा दाखिल करना होगा। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई नौ सितंबर के लिए निर्धारित की। अनाथों की जानकारी भी होनी चाहिए पीठ ने किसी अन्य मामले में पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि अनाथों के संबंध में भी जानकारी होनी चाहिए। पीठ ने कहा कि तब सरकार को अनाथ बच्चों का डाटा स्वतः ही मिल जाएगा। मेहता ने कहा कि ऐसा होना चाहिए। मैं इस मामले को उठाऊंगा क्योंकि अनाथ बच्चे हमारी जिम्मेदारी हैं। भारत में 2.5 करोड़ अनाथ बच्चे जब याचिकाकर्ता ने कहा कि केंद्र को याचिका में उठाए गए पहलुओं पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा जाना चाहिए, तो पीठ ने कहा कि वह सभी मुद्दों पर विचार करेगी। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि भारत कमजोर वर्गों के बच्चों को छात्रवृत्ति, आरक्षण, नौकरी, ऋण आदि जैसे ढेरों समर्थन और अवसर प्रदान करता है, लेकिन अनाथ बच्चों के लिए कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा कि यूनिसेफ के अनुमान के अनुसार भारत में 2.5 करोड़ अनाथ बच्चे हैं।
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