पत्नी का भरण-पोषण करना पति का निरंतर कर्तव्य : शीर्ष कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति का पत्नी का भरण-पोषण करना प्राथमिक कर्तव्य है, जो उसके गरिमापूर्ण जीवन को सुनिश्चित करे। भरण-पोषण राशि की निर्धारण प्रक्रिया में निष्पक्षता और उचितता जरूरी है। कोर्ट ने एक मामले में भरण-पोषण राशि 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये की।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि पति का अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने का दायित्व एक प्राथमिक और निरंतर कर्तव्य है और इसे इस तरह से निभाया जाना चाहिए जिससे पत्नी गरिमापूर्ण जीवन जी सके। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि भरण-पोषण निष्पक्ष, उचित और दोनों पक्षों की सामाजिक स्थिति तथा पति की आर्थिक क्षमता के अनुरूप होना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि भरण-पोषण राशि का निर्धारण निष्पक्ष और उचित हो, और इससे पति पर कोई अत्यधिक बोझ न पड़े। इस प्रक्रिया का उद्देश्य विभिन्न प्रतिस्पर्धी पहलुओं के बीच एक उचित संतुलन स्थापित करना है।
शीर्ष अदालत की ये टिप्पणियां तब सामने आईं, जब उसने एक महिला के भरण-पोषण की राशि 15,000 रुपये प्रति माह से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह कर दी।मामले के अनुसार, पत्नी और पति का विवाह 7 मई, 2023 को नई दिल्ली में हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार हुआ था। विवाह के बाद, पत्नी अपने पति (प्रतिवादी) और उसके परिवार के सदस्यों के साथ ससुराल में ही रहती थी। दोनों पक्षों के बीच संबंध सौहार्द्रपूर्ण नहीं रहे, और शादी के एक साल बाद पत्नी अपने मायके में रहने लगी। चंपावत स्थित पारिवारिक अदालत ने पत्नी को 8,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण राशि देने का आदेश दिया। निर्धारित राशि से असंतुष्ट होकर, पत्नी ने उत्तराखंड हाईकोर्ट का रुख किया, जिसने भरण-पोषण की राशि बढ़ाकर 15,000 रुपये प्रति माह कर दी।
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