Hindi NewsNcr NewsDelhi NewsSupreme Court Dismisses Justice Verma s Petition in Cash Case Clears Impeachment Path
नकदी प्रकरण : जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग का रास्ता साफ

नकदी प्रकरण : जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग का रास्ता साफ

संक्षेप:

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका को खारिज कर दिया, जिससे उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। जस्टिस वर्मा ने जांच समिति की वैधता को चुनौती दी थी, जिसे कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जस्टिस वर्मा को किसी भी प्रकार की राहत नहीं दी जा सकती।

Jan 16, 2026 09:06 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
share Share
Follow Us on

सुप्रीम कोर्ट ने नकदी प्रकरण में जस्टिस वर्मा की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया जस्टिस वर्मा ने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच समिति की वैधता को चुनौती दी थी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी जस्टिस वर्मा इस मामले में किसी भी तरह की राहत पाने के हकदार नहीं समिति गठित करने में किसी भी कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं हुआ याचिकाकर्ता के किसी भी मौलिक अधिकारों का कोई हनन नहीं हुआ प्रभात कुमार नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका सिरे से खारिज कर दी। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति द्वारा उनके जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने का रास्ता साफ हो गया है।

प्यार से लेकर प्रमोशन तक 2026 का पूरा हाल जानें ✨अभी पढ़ें

याचिका उन्होंने पद से हटाने के प्रस्ताव को स्वीकार करने और न्यायाधीशों (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत लोकसभा अध्यक्ष द्वारा आरोपों की जांच के लिए गठित संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि जस्टिस वर्मा को राहत नहीं दी जा सकती है। शीर्ष अदालत ने 60 पन्नों के फैसले में कहा कि न्यायाधीशों (जांच) अधिनियम की धारा 3(2) का पहला प्रावधान तभी लागू होता है जब एक ही दिन दिए गए प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार किए जाते हैं। यह प्रावधान तब लागू नहीं होता जब कोई प्रस्ताव एक सदन में स्वीकार किया जाता है लेकिन दूसरे में नहीं। पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में, जिस सदन द्वारा महाभियोग का प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है, उसका अध्यक्ष स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा के उस दलील को भी ठुकरा दिया, जिसमें कहा गया था कि ‘एक सदन में प्रस्ताव का अस्वीकार होने पर दूसरे सदन में कार्यवाही स्वत: रद्द हो जाती है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘न्यायाधीशों (जांच) अधिनियम में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है जो यह सुझाव दे कि एक सदन में प्रस्ताव अस्वीकृत होने पर दूसरे सदन को कानून के अनुसार आगे बढ़ने में अक्षम बना देगी। इसलिए, याचिकाकर्ता की ओर से पेश इस तर्क में कोई कानूनी आधार नहीं है। पीठ ने कहा कि यदि हम याचिकाकर्ता द्वारा एक सदन में नोटिस की अस्वीकृति के परिणामस्वरूप दूसरे सदन में नोटिस के स्वचालित रूप से विफल होने की व्याख्या स्वीकार करते हैं तो इसके बहुत व्यापक और गंभीर परिणाम होंगे। ‘सभापति की जगह उपसभापति का पद्भार संभालना संवैधानिक व्यवस्था’ सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि संविधान के अनुसार राज्यसभा के सभापति की गैर मौजूदगी में उप सभापति को सभापति का पद्भार संभालना होता है और सभापति के कर्तव्यों का पालन करना होता है। शीर्ष अदालत ने इसे एक संवैधानिक व्यवस्था माना जो रिक्ति के कारण सदन को निष्क्रिय होने से रोकने के लिए थी। कानून के प्रावधानों अनदेखी नहीं कर सकते पीठ ने याचिकाकर्ता की इन दलीलों को भी खारिज कर दिया कि न्यायाधीशों (जांच) अधिनियम में ‘सभापति’ शब्द को संकीर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिए ताकि उपसभापति को बाहर रखा जा सके। शीर्ष कोर्ट ने साफ कहा कि किसी कानून को संविधान में दिए गए प्रावधानों की अनदेखी करके नहीं पढ़ा जा सकता है और जांच अधिनियम की व्याख्या करते समय अनुच्छेद 91 को अलग नहीं रखा जा सकता है। जस्टिस वर्मा की यह आशंका भी खारिज सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की इस आशंका को भी खारिज कर दिया कि अगर उपसभापति प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाले होते, तो वे पक्षपाती हो सकते थे, इसे काल्पनिक बताया। इसने आगे कहा कि अगर ऐसी स्थिति आती भी है, तो खुद को अलग करने या जरूरत के सिद्धांत से इसे सुलझाया जा सकता है। पीठ ने कहा कि सभापति शब्द की इस तरह से व्याख्या करना असंगत होगा जिससे संवैधानिक रिक्तता पैदा हो और रिक्ति के दौरान जांच अधिनियम काम न कर पाए। राज्यसभा के महासचिव पर उठाया सवाल सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यसभा सचिवालय की भूमिका पर उसकी टिप्पणियां सिर्फ भविष्य के मार्गदर्शन के लिए थीं और मामले के नतीजे पर उनका कोई असर नहीं पड़ा क्योंकि उपसभापति का प्रस्ताव स्वीकार नहीं करने का फैसला चुनौती के दायरे में नहीं था। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि राज्यसभा के महासचिव ने नोटिस की सामग्री की जांच करके, तथ्यों की सटीकता पर सवाल उठाकर और नोटिस को ‘सही नहीं’ मानकर अपने विशुद्ध प्रशासनिक काम से आगे बढ़कर काम किया। पीठ ने साफ किया कि उस चरण पर सचिवालय का काम सिर्फ प्रशासनिक जांच करना और नोटिस को सक्षम अधिकारी के सामने रखना था, न कि ‘अर्ध-न्यायिक काम’ प्राधिकार की तरह काम करना था। यह है मामला दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जज जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थिति सरकारी घर में मार्च 2025 में आग बुझाने के दौरान भारी मात्रा में अधजली नोट मिलने का मामला सामने आया था। देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित जजों की समिति ने इस मामले में जस्टिस वर्मा को दोषी मानते हुए पद से हटाने की सिफारिश की की थी। इसके बाद तत्कलीन सीजेआई संजीव खन्ना ने इस मामले में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए महाभियोग की सिफारिश की थी।