
संविधान पीठ का फैसला: उच्चतर न्यायिक सेवा में पदोन्नत जजों के लिए नहीं मिलेगा आरक्षण
प्रभात कुमार नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ ने उच्चतर
प्रभात कुमार नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ ने उच्चतर न्यायिक सेवा (एचजेएस) में पदोन्नत न्यायाधीशों के लिए कोई विशेष कोटा या वरीयता देने से इनकार कर दिया। संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि देश में असमान प्रतिनिधित्व की कोई राष्ट्रव्यापी पैटर्न नहीं है, जिसके लिए ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता हो। देश के प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई की अगुवाई वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि ‘न्यायिक अधिकारियों में नाराजगी की भावना उच्चतर न्यायिक सेवा (एचजेएस) संवर्ग के भीतर किसी भी कृत्रिम वर्गीकरण को उचित नहीं ठहरा सकती।
पीठ ने कहा है कि विभिन्न स्रोतों (नियमित पदोन्नति, सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा और सीधी भर्ती) से एक ही संवर्ग में प्रवेश और वार्षिक रोस्टर के अनुसार वरिष्ठता प्राप्त होने पर, पदधारी उस स्रोत को खो देते हैं जहां से उनकी भर्ती हुई है।’ संविधान पीठ ने यह भी कहा कि एचजेएस के भीतर चयन ग्रेड और सुपर टाइम स्केल में नियुक्ति संवर्ग के भीतर योग्यता-सह-वरिष्ठता पर आधारित है और यह न्यायपालिका के निचले स्तरों पर सेवा की अवधि या प्रदर्शन पर निर्भर नहीं हो सकती। फैसले में कहा गया है कि कानूनी दावे, अवैध इनकार या कम से कम वैध अपेक्षा के बिना न्यायिक अधिकारियों के असंतोष और नाराजगी का अनुभव, किसी कैडर के भीतर सदस्यों का कृत्रिम वर्गीकरण नहीं कर सकता है। संविधान पीठ में सीजेआई गवई के अलावा, जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, के. विनोद चंद्रन और जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं। संविधान पीठ ने 59 पन्नों के फैसले में कहा है कि ‘सांख्यिकीय आंकड़े अलग-अलग हैं और एचजेएस में नियमित पदोन्नत व्यक्तियों (आरपी) के इस तरह के असंतोष और नाराजगी को उचित ठहराने के लिए कोई ठोस आधार प्रदान नहीं करते हैं।’ पीठ ने कहा है कि उच्चतर न्यायिक सेवा (एचजेएस) के भीतर चयन ग्रेड और सुपर टाइम स्केल में नियुक्ति संवर्ग के भीतर योग्यता-सह-वरिष्ठता पर आधारित है और न्यायपालिका के निचले स्तरों पर सेवा की अवधि या प्रदर्शन पर निर्भर नहीं हो सकती। पीठ ने कहा है कि नियमित पदोन्नत और एलडीसीई के एचजेएस में आने के बाद सिविल न्यायाधीश के रूप में सेवा अपना महत्व खो देती है। सीजेआई गवई ने कहा है कि ‘एक सिविल न्यायाधीश के रूप में कार्यकाल और प्रदर्शन, जिला न्यायाधीश के सामान्य संवर्ग में पदधारियों को वर्गीकृत करने के लिए कोई स्पष्ट अंतर नहीं रखते।’ संविधान पीठ ने अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ की ओर से दाखिल याचिका पर विचार करते हुए दिया है। देश भर के न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता और करियर प्रगति का मुद्दा 1989 में अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ द्वारा दायर एक याचिका में उठा था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 7 अक्टूबर को, देश भर के निचले न्यायिक अधिकारियों के सामने आने वाले करियर में ठहराव से संबंधित मुद्दों को पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ को भेज दिया था। जिला जज बनने के हैं पर्याप्त मौके संविधान पीठ ने कहा है कि सेवारत न्यायिक अधिकारियों के पास जिला न्यायाधीश के रूप में पदोन्नति के पर्याप्त अवसर हैं। पीठ ने कहा है कि हाल ही में रजनीश मामले में पारित फैसले के बाद। इस फैसले में जिला न्यायाधीश के रूप में सीधी भर्ती के लिए आवेदन करने की अनुमति दी गई है। साथ ही, सेवा अवधि में कमी की शर्त के साथ सिविल जज (वरिष्ठ श्रेणी) के रूप में त्वरित पदोन्नति की सुविधा भी मिलती है। संविधान पीठ ने यह भी कहा कि व्यक्तिगत आकांक्षाएं किसी भी सेवा में एक सामान्य घटना हैं और वे वरिष्ठता नियमों का मार्गदर्शन नहीं कर सकतीं। जजों के लिए वरिष्ठता तय करने के लिए दिशा-निर्देश जारी संविधान पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए जिला जज के पदों को भरने के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए। फैसले के तहत जारी दिशा-निर्देश इस प्रकार हैं - उच्चतर न्यायिक सेवा (एचजेएस) के अधिकारियों की वरिष्ठता एक वार्षिक 4-बिंदु रोस्टर के माध्यम से निर्धारित की जाएगी, जिसे उस विशेष वर्ष में नियुक्त सभी अधिकारियों द्वारा 2 नियमित पदोन्नत, 1 एलडीसीई और 1 डीआर के आवर्ती क्रम में भरा जाएगा। - केवल तभी जब भर्ती प्रक्रिया उस वर्ष के भीतर पूरी हो जाती है जिसके बाद इसे शुरू किया गया था और उस आगामी वर्ष के लिए शुरू की गई भर्ती के संबंध में तीनों स्रोतों में से किसी से भी कोई अन्य नियुक्ति पहले ही नहीं हुई है, तो इस प्रकार विलम्ब से नियुक्त अधिकारी उस वर्ष के रोस्टर के अनुसार वरिष्ठता के हकदार होंगे, जिसमें भर्ती शुरू की गई थी। - यदि किसी वर्ष में उत्पन्न रिक्तियों के लिए उसी वर्ष भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं की जाती है, तो बाद की भर्ती में ऐसी रिक्ति को भरने वाले उम्मीदवार को उस वर्ष के वार्षिक रोस्टर के भीतर वरिष्ठता प्रदान की जाएगी, जिसमें भर्ती प्रक्रिया अंतिम रूप से संपन्न हुई हो और नियुक्ति की गई हो। - किसी विशेष वर्ष के लिए जिला न्यायाधीशों की सीधी भर्ती और सीमित विभागीय न्यायाधीशों (एलडीसीई) की भर्ती पूरी होने के बाद, उनके कोटे में आने वाले वे पद जो उपयुक्त अभ्यर्थियों के अभाव में रिक्त रह जाते हैं, उन्हें भर्ती निरीक्षकों के माध्यम से भरा जाएगा, बशर्ते कि ऐसे भर्ती नियमित पदोन्नत (आरपी) को वार्षिक रोस्टर में केवल बाद के नियमित पदोन्नत (आरपी) पदों पर ही रखा जाए और आगामी वर्ष में रिक्तियों की गणना इस प्रकार की जाएगी कि पूरे संवर्ग पर 50:25:25 का अनुपात लागू हो। - संबंधित राज्यों में एचजेएस को नियंत्रित करने वाले वैधानिक नियम, उच्च न्यायालयों के परामर्श से, वार्षिक रोस्टर के सटीक तौर-तरीकों और इस निर्णय के निर्देशों को कैसे लागू किया जाएगा, यह निर्धारित करेंगे।

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