
जस्टिस यशवंत वर्मा को जांच समिति के समक्ष जवाब दाखिल करने के लिए समय देने से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा को महाभियोग मामले में जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय देने से इनकार कर दिया। जस्टिस वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए संसदीय समिति का गठन किया गया है। कोर्ट ने कहा कि वर्मा को अपना जवाब दाखिल करना चाहिए।
नई दिल्ली। विशेष संवाददाता सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महाभियोग का सामना कर रहे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा को उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप की जांच कर रही संसदीय समिति के समक्ष जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय देने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने जस्टिस वर्मा से कहा कि आप अपना जवाब दाखिल करें। दिल्ली स्थित सरकारी घर में लगी आग बुझाने के दौरान मिली नगदी के बाद महाभियोग का सामना कर रहे जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष ने संसदीय समिति का गठन किया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा न्यायाधीशों (जांच) अधिनियम 1968 के तहत गठित संसदीय समिति की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित करते हुए यह निर्देश दिया।
जस्टिस वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने शीर्ष अदालत से कहा कि याचिकाकर्ता को 12 जनवरी तक समिति के समक्ष आरोप पत्र पर अपना जवाब देना है, इसलिए इसकी समय सीमा बढ़ाई जाए। हालांकि, पीठ ने जवाब देने के लिए समय सीमा बढ़ाने इनकार कर दिया। जस्टिस दत्ता ने कहा कि ‘समिति के समक्ष आप अपना जवाब दाखिल करें। इससे पहले, शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘यदि राष्ट्रपति की गैरमौजूदगी में उप राष्ट्रपति उनका काम कर सकते हैं, तो राज्यसभा के सभापति की गैरमौजूदगी में उनका काम उपसभापति क्यों नहीं कर सकते। पीठ ने जस्टिस वर्मा की उन दलीलों से असहमति जताते हुए की है, जिसमें कहा गया कि राज्यसभा के उपसभापति के पास महाभियोग के लिए भेजे गए प्रस्ताव खारिज करने का का कोई अधिकार नहीं है और न्यायाधीशों (जांच) अधिनियम 1968 के तहत, सिर्फ लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति के पास ही किसी जज के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव को स्वीकार करने या खारिज करने का अधिकार है। जस्टिस वर्मा ने जांच के लिए गठित संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी है। पीठ ने सभी पक्षों को सुनने के बाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया और सभी पक्षों से सोमवार तक अपना-अपना लिखित नोट दाखिल करने का निर्देश दिया। जस्टिस वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा ने शीर्ष अदालत को बताया संविधान के अनुच्छेद 91, जो राज्यसभा के उपसभापति को सभापति के गैरमौजूदगी में उनके कार्यालय का काम करने की अनुमति देता है, लेकिन न्यायाधीशों (जांच) अधिनियम के प्रावधानों के तहत सभापति को मिली अपनी समझ से काम करने की ताकत का इस्तेमाल करने का आधार नहीं हो सकता। वरिष्ठ अधिवक्ता लूथरा ने पीठ से कहा कि इस मामले को राज्यसभा के नये सभापति नियुक्त होने तक इंतजार किया जा सकता था। उन्होंने कहा कि उपराष्ट्रपति व राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ ने इस्तीफा दे दिया था और इसके बाद उपसभापति हरिवंश ने महाभियोग के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता रोहतगी ने कहा कि कानून उपसभापति को महाभियोग के प्रस्ताव को स्वीकार करने या खारिज करने का अधिकार नहीं देता और सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को ही ऐसा करने का अधिकार है। जस्टिस दत्ता ने इन दलीलों को दरकिनार करते कहा कि ‘देश को आगे बढ़ना है, संविधान वैक्यूम में काम नहीं करता। यदि राष्ट्रपति की गैरमौजूदगी में उप राष्ट्रपति उनका काम कर सकते हैं, तो राज्यसभा के सभापति की गैरमौजूदगी में उनका काम उपसभापति क्यों नहीं कर सकते। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता रोहतगी से आगे कहा कि राष्ट्रपति की गैरमौजूदगी में, अगर उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के तौर पर जजों के नियुक्ति वारंट पर साइन कर सकते हैं, तो उपसभापति, सभापति की गैरमौजूदगी में महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार या खारिज क्यों नहीं कर सकते।’ इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता रोहतगी ने कहा कि उपसभापति, सभापति के सामान्य काम कर सकते हैं, लेकिन न्यायाधीशों की जांच के लिए बने कानून जज (इन्क्वायरी) एक्ट सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति को ही इस बारे में अधिकार देता है। कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो यह कहता हो कि सभापति का उपसभापति से होगा और उसमें शामिल होगा। ... अव्यवहारिक हो जाएगा कानूनी प्रावधान- जस्टिस दत्ता जस्टिस दीपांकर दत्ता ने जस्टिस वर्मा की ओर से दिए गए दलीलों से सहमत होने और कानून की इस तरह से व्याख्या करने पर यह पूरी तरह से अव्यवहारिक हो जाएगा। उन्होंने कहा कि यह तर्क कानून को काम नहीं करने लायक बना देगा और कोर्ट कानून का गलत इस्तेमाल नहीं कर सकता। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि कानून के दायरे से बाहर जाने की कोई गुंजाइश नहीं है और एक जज, जो महाभियोग का सामना कर रहा है, उसे यह मांग करने का अधिकार है कि कानून के तहत तय प्रक्रिया का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। उन्होंने पीठ से कहा कि उपसभापति द्वारा प्रस्ताव को खारिज करने का कदम अवैध था। उन्होंने कहा कि एक सदन जांच आगे नहीं बढ़ा सकता जब दूसरे सदन ने उसी सामग्री पर जज के खिलाफ प्रस्ताव को खारिज कर दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता रोहतगी ने कहा कि यह मायने नहीं रखता है कि याचिकाकर्ता को कोई नुकसान नहीं हुआ या होगा, बल्कि कानूनी प्रक्रिया के पालन में किसी भी तरह की अनदेखी नहीं हो। लोकसभा अध्यक्ष की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत से कहा कि न्यायाधीशों जांच अधिनियम 1968 की धारा 3(2) का प्रावधान दो सदनों द्वारा एक ही मामले में दो अलग-अलग जांच कमेटियां बनाने की स्थिति से बचने के लिए है। उन्होंने धारा 3(2) के दूसरे प्रोवाइजो का जिक्र किया, जिसमें कहा गया है कि अगर दो अलग-अलग दिनों में दो प्रस्ताव दिए जाते हैं, तो बाद वाला प्रस्ताव रद्द हो जाएगा। इन प्रावधानों के आधार पर, मेहता ने कहा कि कानून का मकसद यह था कि केवल एक ही प्रस्ताव लंबित रहे। उन्होंने कहा कि कानून का मकसद दो जांच कमेटियों के गठन से बचना है, ताकि एक ही सामग्री पर कोई विरोधाभासी राय न हो। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष फैसले के कारण याचिकाकर्ता को कोई स्पष्ट नुकसान नहीं हुआ है। उन्होंने सवाल उठाया कि ‘क्या कोर्ट अनुच्छेद 32 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करेगा और इस प्रक्रिया को फिर से शुरू करवाएगा, जबकि अध्यक्ष या कमेटी के सदस्यों की योग्यताओं के खिलाफ कोई आरोप नहीं है?

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