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प्रक्रिया शुरू होने के बाद दाखिला मानदंड नहीं बदल सकते : कोर्ट

प्रक्रिया शुरू होने के बाद दाखिला मानदंड नहीं बदल सकते : कोर्ट

संक्षेप:

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को खेल कोटे के तहत एमबीबीएस और बीडीएस पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए लचीली प्रक्रिया अपनाने पर फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि एक बार प्रक्रिया शुरू होने के बाद मानदंडों में बदलाव नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

Jan 06, 2026 10:12 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पंजाब सरकार को शैक्षिक सत्र 2024 में खेल कोटे के तहत एमबीबीएस और बीडीएस पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए ‘लचीली’ प्रक्रिया अपनाने पर फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि एक बार प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश मानदंडों को बदला नहीं जा सकता है। जस्टिस संजय कुमार और आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि जिस तरह भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद भर्ती के नियमों में बदलाव कानून में मना है, उसी तरह दाखिला प्रक्रिया शुरू होने से पहले उसके सभी पहलुओं को पूरी तरह से परिभाषित न करना भी गैरकानूनी है।

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यह इसलिए है कि ताकि संबंधित अधिकारियों को बाद में अपने हितों के अनुसार नियम तय करने या भाई-भतीजावाद की अनुमति देने की गुंजाइश न रहे। पीठ ने कहा कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने और मनमानी रोकने के लिए ऐसी प्रक्रिया में पारदर्शिता सबसे जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट दिवजोत सेखो और शुभकर्मन सिंह द्वारा सत्र 2024 में खेल कोटे के तहत एमबीबीएस और बीडीएस पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए पंजाब सरकार द्वारा अपनाए गए प्रवेश मानदंडों के खिलाफ दायर अपीलों की सुनवाई कर रहा था। पीठ ने निर्देश दिया कि सेखों और सिंह को सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीटों पर दाखिला दिया जाए। निर्णय तर्कसंगत हो मनमाना नहीं अदालत ने कहा कि राज्य और उसकी संस्थाओं का कर्तव्य और जिम्मेदारी है कि वे संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार निष्पक्ष और उचित तरीके से कार्य करें और राज्य द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय तर्कसंगत होना चाहिए, मनमाना नहीं। नीतिगत निर्णय मनमाने होंगे तो कोर्ट दखल करेगी पीठ ने कहा कि हालांकि पंजाब राज्य अपने तर्क के समर्थन में कानूनी मिसालों का हवाला देना चाहेगा कि कोर्ट आमतौर पर नीतिगत मामलों में दखल नहीं दे सकता। पीठ ने आगे कहा कि यह भी सर्वविदित है कि जब कोई नीतिगत निर्णय मनमानी भरा हो या उसमें मनमानी की गुंजाइश हो, तो अदालत उसे रद्द करने में न्यायोचित होगी। राज्य के तर्क बेदम पीठ ने कहा कि यह सच है कि नीति निर्माताओं को नीति बनाने में कुछ हद तक छूट मिलनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मनमानी या भाई-भतीजावाद की अनुमति दी जाए। इसलिए, हमें पंजाब राज्य के तर्कों में कोई दम नहीं दिखता।