खनन माफिया से मुकाबला करने में राज्य बेबसी नहीं दिखा सकते- सुप्रीम कोर्ट

Newswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार की बेबसी पर नाराजगी जताई है, जो रेत खनन माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई करने में असमर्थ है। कोर्ट ने कहा कि वन अधिकारियों के पास पर्याप्त हथियार नहीं हैं, जबकि माफिया के पास बेहतर संसाधन हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अवैध रेत खनन पर ठोस उपाय करने का निर्देश दिया है।

खनन माफिया से मुकाबला करने में राज्य बेबसी नहीं दिखा सकते- सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। विशेष संवाददाता राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में रेत/खनन माफियाओं का मुकाबला करने में बेबसी जाहिर करने पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मध्य प्रदेश सरकार को आड़े हाथ लिया। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश सरकार के उस दलील को ‘चौंकाने वाला और परेशान करने वाला‌’ बताया, जिसमें सरकार ने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा था कि उसके वन अधिकारियों के पास रेत माफिया के हथियारों का मुकाबला करने के लिए पर्याप्त हथियार नहीं हैं।जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि राज्य को बेबसी का बहाना बनाने या अपनी ही कमियों की आड़ लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती, खासकर तब जब ये कमियां सीधे तौर पर गैर-कानूनी गतिविधियों, हिंसा, जान-माल के नुकसान और गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए जरूरी आवासों के ऐसे विनाश को बढ़ावा देती हैं जिसकी भरपाई नहीं हो सकती।

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पीठ ने राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में ‘अवैध रेत खनन और लुप्तप्राय जलीय वन्यजीवों को खतरा’ से जुड़े मामले में कई सुधारात्मक निर्देश जारी करते हुए यह टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि ‘इससे भी अधिक चौंकाने वाली और परेशान करने वाली बात यह है कि हमारे संज्ञान में यह तथ्य लाया गया है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के सामने दायर एक हलफनामे में, मध्य प्रदेश सरकार की ओर से यह कहा गया है कि वन अधिकारियों के पास रेत माफिया से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए जरूरी उपकरण, विशेष रूप से पर्याप्त हथियार नहीं हैं, जबकि रेत माफिया के पास कथित तौर पर बेहतर हथियार और आधुनिक वाहन हैं।’ सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि यह खुलासा, निष्क्रियता को सही ठहराने के अलावा, तैयारी की चौंकाने वाली कमी और गैर-कानूनी तथा संगठित अवैध खनन गतिविधियों से निपटने में राज्य मशीनरी की ओर से संस्थागत इच्छाशक्ति की कमी को भी उजागर करता है।पीठ ने कहा है कि यह मध्य प्रदेश और राजस्थान सरकारों की ओर से अपने मौलिक संवैधानिक दायित्वों को निभाने के प्रति पूरी तरह से और स्पष्ट उदासीनता को दर्शाता है, ‌ये दायित्व हैं सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और उन गैर-कानूनी तथा अराजक गतिविधियों को रोकना जिनका आम जनता और संबंधित नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। पीठ ने कहा है कि ‘प्रवर्तन कर्मियों को पर्याप्त रूप से सुसज्जित करने और आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते समय उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफलता, शासन और कानून के शासन की मूल नींव पर ही प्रहार करती है।’ पीठ ने कहा कि उसे यह कहना पड़ रहा है कि इस तरह का रवैया न सिर्फ अपराध करने वालों का हौसला बढ़ाता है, बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने की राज्य की क्षमता पर लोगों का भरोसा भी कम करता है। इसलिए, प्रशासन के सबसे ऊंचे स्तर पर तुरंत, ठोस और जवाबदेह सुधार के उपाय करना जरूरी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हमारी सोची-समझी राय है कि सबसे पहला और जरूरी कदम निगरानी और इसके लिए लिए प्रभावी प्रणाली मजबूत करना है, ताकि अवैध रेत-खनन की गतिविधियों को असरदार तरीके से रोका और हतोत्साहित किया जा सके। अदालत ने कहा कि एक मजबूत, तालमेल वाला और टेक्नोलॉजी पर आधारित सिस्टम, जो रियल-टाइम मॉनिटरिंग और तुरंत कार्रवाई सुनिश्चित करे, ऐसी गैर-कानूनी गतिविधियों को लगातार होने से रोकने और प्रभावित इलाकों में क़ानून का राज फिर से कायम करने के लिए बहुत जरूरी है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य को राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य भी कहा जाता है। 5,400 वर्ग किलोमीटर में फैला यह अभयारण तीनों राज्यों का संरक्षित क्षेत्र है। लुप्तप्राय घड़ियाल के अलावा यहां रेड क्राउन्ड रूफ प्रजाति के कछुए और लुप्तप्राय गंगा नदी डॉल्फिन का भी आवास है।वाई-फाई युक्त सीसीटीवी लगाए जाएं ताकि अवैध खनन पर लगे रोकसुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नदी तल पर अंधाधुंध अवैध रेत खनन ने एक पर्यावरणीय संकट पैदा किया है और यह राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में विनाश का कारण बना है जिससे घड़ियाल संरक्षण परियोजना के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है। शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे से निपटने में पूरी तरह विफल रहने के लिए राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई और इन इलाकों में अवैध रेत खनन के लिए अक्सर इस्तेमाल किए जाने वाले मार्गों पर उच्च-रिजॉल्यूशन वाले वाई-फाई-सक्षम सीसीटीवी कैमरे लगाने के निर्देश दिया है। पीठ ने निर्देश दिया कि ऐसे कैमरों की लाइव फीड‌ संबंधित जिले के पुलिस अधीक्षक (एसपी) या वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) और संभागीय वन अधिकारी के सीधे नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण में रखी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये अधिकारी उपयुक्त अधिकारियों को नियुक्त करके सीसीटीवी फुटेज की निरंतर और प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन राज्यों के सक्षम अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने को कहा कि अवैध रेत खनन में शामिल पाए जाने वाले वाहनों या मशीनों को जब्त किया जाए तथा इसमें शामिल व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा शुरू किया जाए।तो अर्ध सैनिक बल करेंगे तैनातमामले की अगली सुनवाई 11 मई तय करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि उसे मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश राज्यों से उम्मीद है कि वे अवैध खनन से निपटने के लिए ठोस और असरदार उपाय लेकर आएंगे। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो अदालत को अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करके उचित निर्देश जारी करने पड़ेंगे, जिनमें अर्धसैनिक बलों की तैनाती भी शामिल हो सकती है। पीठ ने यह भी कहा कि अगर ये राज्य ठोस कदम नहीं उठाते हैं, तो अदालत मध्य प्रदेश और राजस्थान में रेत-खनन पर पूरी तरह से रोक लगाने का निर्देश दे सकती है। साथ ही, उन राज्यों पर भारी जुर्माना भी लगा सकती है जो उन अहम आवासों और नदी के इकोसिस्टम की रक्षा करने में नाकाम रहे हैं, जो सभी तरह के जीवन को बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी हैं।

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