
घरेलू सहायक: सुप्रीम कोर्ट ने 40 हजार लेकर एजेंसी ने कर्मचारी को दिए महज 19 हजार- सीजेआई
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने घरेलू कामगारों के शोषण को लेकर सेवा प्रदाता एजेंसियों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक एजेंसी को 40,000 रुपये का भुगतान किया, लेकिन कामगारों को केवल 19,000 रुपये दिए गए। न्यायालय ने न्यूनतम वेतन को मौलिक अधिकार बनाने की याचिका पर विचार करने से इनकार किया।
नई दिल्ली। विशेष संवाददाता देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने गुरुवार को कहा कि ‘घरेलू कामगारों का शोषण करने वाली सर्विस प्रोवाइडर एजेंसियों की तीखी आलोचना की, और कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी एक एजेंसी को प्रति कर्मचारी 40,000 रुपये का भुगतान किया था, लेकिन कर्मचारियों को सिर्फ 19,000 रुपये दिए गए।’ उन्होंने न्यूनतम वेतन को मौलिक अधिकार बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए यह जानकारी दी। सीजेआई ने कहा कि ‘मैंने व्यक्तिगत रूप से और आधिकारिक तौर पर यह देखा है, सुप्रीम कोर्ट ने कुशल कर्मचारियों के एक खास ग्रुप को काम पर रखने के लिए एक एजेंसी को 40,000 रुपये भुगतान किए गए, और असल में उन गरीब कर्मचारियों (लड़कियों) को सिर्फ 19,000 रुपये मिल रहे थे।’
उन्होंने आगे कहा कि ऐसे शहरी केंद्रों में ऐसी एजेंसियां ‘असली शोषक’ के रूप में उभरी हैं। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि ‘सभी बड़े शहरों में, सेवा मुहैया कराने वाले एजेंसियों ने कब्जा कर लिया है। अब आप सिर्फ इन संस्थाओं की सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं, उनके लिए एक शब्द है, जिसका इस्तेमाल मैं खुली अदालत में नहीं कर सकता। सभी बड़े शहरों में, ये बड़ी संस्थाएं हैं, जो इन लोगों का शोषण कर रही हैं। वे असली शोषक हैं।’ सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ पेन थोजिलार्गल संगम और अन्य ट्रेड यूनियनों की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के कर रही थी, जिसमें घरेलू कामगारों के लिए कल्याणकारी उपायों की मांग की गई थी, जिसमें उन्हें न्यूनतम मजदूरी को मौलिक अधिकार बनाने और अधिसूचना के तहत लाना भी शामिल था। पीठ ने याचिका पर यह कहते सुनवाई से इनकार कर दिया और कहा कि यह नीतिगत मसला है, इसलिए बेहतर होगा कि इन्हें राज्य सरकारों पर छोड़ दिया जाए। ट्रेड यूनियन देश में औद्योगिक विकास रोकने में निभाई है महत्वपूर्ण भूमिका- सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर विचार करने के इनकार करते हुए कहा कि ‘ट्रेड यूनियनवाद ने देश में औद्योगिक विकास को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। देश में कितने औद्योगिक इकाइयां ट्रेड यूनियनों की वजह से बंद हो गई हैं? सभी पारंपरिक उद्योग... ये सब इन झंडा उठाने वाली यूनियनों की वजह से बंद हो गए हैं। वे काम नहीं करना चाहते।’ हालांकि पीठ ने यह स्वीकार किया कि शोषण मौजूद है लेकिन कौशल विकास और व्यक्तिगत अधिकारों के बारे में जागरूकता जैसे वैकल्पिक सुधारों के माध्यम से इसे संबोधित किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा कि घरेलू रोजगार में न्यूनतम मजदूरी लागू करने से ‘हर घर मुकदमेबाजी में घसीटा जा सकता है। जब याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने पीठ से कहा कि सामूहिक सौदेबाजी काम करती है और याचिकाकर्ता पंजीकृत ट्रेड यूनियन हैं, तो सीजेआई सूर्यकांत ने अपनी चिंताओं को दोहराया और कहा कि कोई व्यापक सामान्यीकरण न किया जाए। मुख्य न्यायाधीश ने आगाह किया कि अच्छे इरादे वाले कल्याणकारी उपायों से कभी-कभी अनपेक्षित परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि सुधारों की चिंता में, कानूनी तरीकों से कुछ गैर-भेदभाव वाला लाने की कोशिश में, हम कभी-कभी अनजाने में और अधिक शोषण का कारण बन जाते हैं। आप न्यूनतम मजदूरी तय करेंगे, तो लोग काम पर रखने से मना कर देंगे। यह मांग और आपूर्ति का सवाल है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अब मजदूर और मालिक के बीच भरोसे का तत्व खत्म हो गया है क्योंकि उन्हें ठेकेदारों के जरिए काम पर रखा जाता है। पहले, घरेलू नौकरों को बढ़े हुए परिवार के सदस्य के रूप में माना जाता था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘जब आप इन एजेंसियों के जरिए काम पर रखना शुरू करेंगे, तो क्या होगा? मानवीय जुड़ाव नहीं रहेगा। लोग एक ही घर में रहते हैं, एक ही खाना खाते हैं। एक बार जब वह भरोसा टूट जाता है, तो उसके परिणाम सामने आएंगे।’ इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता रामचंद्रन ने कहा कि घरेलू कामगारों को पर्याप्त मजदूरी दिए बिना काम पर रखना बंधुआ मजदूरी या बेगार के बराबर है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 का उल्लंघन है, जो पहले के सुप्रीम कोर्ट के न्यायशास्त्र पर आधारित है। उन्होंने कहा कि जबकि कुछ राज्यों ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी अधिसूचित की है, कई अन्य ने ऐसा नहीं किया है, इसके बावजूद कि घरेलू रोजगार की प्रकृति सभी राज्यों में समान है। इस पर पीठ ने कहा कि ‘निस्संदेह शोषण होता है, लेकिन शोषण से निपटने के उपाय भी हैं। लोगों को उनके व्यक्तिगत अधिकारों के बारे में अधिक जागरूक किया जाना चाहिए, लोगों को अधिक कुशल बनाया जाना चाहिए था और भी कई सुधार किए जाने चाहिए थे।’ पीठ ने कहा कि देश भर में लाखों घरेलू सहायकों की दुर्दशा की बात को स्वीकार करते हुए कहा कि ‘न्यायपालिका कानूनों को लागू करने के लिए विधायिका के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं कर सकती। अपने आदेश में पीठ ने कहा है कि जब तक विधायिका से उपयुक्त कानून बनाने का अनुरोध नहीं किया जाता, तब तक कोई भी लागू करने योग्य आदेश पारित नहीं किया जा सकता। इस अदालत द्वारा ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया जाना चाहिए।’ पीठ ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए, इसका निपटारा कर दिया।

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