
मानव तस्करी के आरोप में जमानत देने के लिए हल्के -फुल्के आदेश पारित करने पर उच्च न्यायालय को फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने मानव तस्करी के आरोप में आरोपी को जमानत पर रिहा करने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय की आलोचना की। अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय ने आरोपों की गंभीरता का सही से मूल्यांकन नहीं किया। आरोपी तुलसी को जमानत रद्द करते हुए एक सप्ताह में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया गया है।
नई दिल्ली। विशेष संवाददाता सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मानव तस्करी के आरोपों की गंभीरता पर विचार किए बगैर आरोपी को जमानत पर रिहा किए जाने के लिए हल्के-फुल्के आदेश पारित करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट उच्च न्यायालय की कड़ी खिंचाई की। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने जमानत के इस आदेश को चुनौती नहीं देने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पर भी सवाल उठाया है। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस विनोद के चंद्रन की पीठ ने कहा कि जब उच्च न्यायालय ने आरोपी को जमानत दे दी तो राज्य सरकार ने उस आदेश को चुनौती देने के लिए गंभीरता क्यों नहीं दिखाई।
पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा मानव तस्करी मामले में आरोपी महिला को जमानत देने के आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि ‘इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आरोपों की गंभीरता और महत्व पर ठीक से विचार किए बगैर ही जमानत का आदेश दे दिया है।’ सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी महिला तुलसी की जमानत रद्द करते हुए, उसे एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है। पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले ‘संगठन गुड़ीया स्वयंसेवी संस्थान’ की याचिका पर यह फैसला दिया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट्ट ने पीठ से कहा कि आरोपी तुलसी पर अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 के तहत है। लेकिन उच्च न्यायालय ने आरोपों की गंभीरता पर विचार किए बगैर ही इस आधार पर जमानत दे दी कि आरोपी 5 साल जेल में बिताए हैं और मामले के अन्य सह-आरोपियों को जमानत मिल चुकी है। उन्होंने पीठ से से कहा कि मौजूदा आरोपी तुलसी की भूमिका दो अन्य तस्करी मामलों की जांच के दौरान सामने आया, जिसमें छोटे बच्चों को वेश्यावृत्ति में धकेला गया था। उन्होंने आगे कहा कि पीड़िता ने आरोपी को खास तौर पर पहचाना था। वरिष्ठ अधिवक्ता भट्ट ने पीठ से कहा कि ‘वह जब भी जमानत पर बाहर आई है, उसने बच्चों की तस्करी और वेश्यावृत्ति को बढ़ावा दिया है। उन्होंने कहा कि आरोपी वाराणसी के रेड लाइट इलाके में एक जानी-मानी तस्कर है। मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस कुमार ने कहा कि सभी तथ्यों को देखने से साफ है कि उच्च न्यायालय का यह बहुत ही मैकेनिकल आदेश है जो एक ही टेम्पलेट का उपयोग करके बनाया गया है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से, मैंने आदेश पारित करने वाले जज द्वारा पारित बहुत सारे जमानत आदेश देखे हैं। मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से कहा कि वह पहले ही जेल की सजा काट चुकी है और याचिकाकर्ता संगठन वैसा नहीं है जैसा वह खुद को दिखाता है, तो जस्टिस कुमार ने कहा कि आरोपी की पहचान खुद पीड़िता ने की है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हम पाते हैं कि उच्च न्यायालय ने आरोपों की गंभीरता पर विचार किए बगैर ही आरोपी को जमानत दी है। जस्टिस कुमार ने कहा कि ‘हम पाते हैं कि अपराध की प्रकृति और गंभीरता का उल्लेख किए बिना और उस विशेष मामले में मौजूद वास्तविक स्थितियों पर विचार किए बिना भी इसी तरह के आदेश पारित किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भले ही हाईकोर्ट पर काम का बोझ अधिक हो, फिर भी उससे जमानत के आदेश पारित करते समय अपने विवेक का इस्तेमाल करने की उम्मीद की जाती है, खासकर इस तरह के मामलों में जिनमें बच्चों की तस्करी के आरोप शामिल हैं।’ यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी महिला की जमानत को रद्द करते हुए एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हमें यह देखकर भी हैरानी हुई कि उत्तर प्रदेश सरकार अब इस तरह के मामले में जमानत रद्द करने की मांग करने के लिए आगे आया है। पीठ ने कहा कि ऐसा लगता है कि उच्च न्यायालय में जज इस बात में एक-दूसरे से मुकाबला कर रहे हैं कि वे एक दिन में कितनी जमानत याचिकाओं का निपटारा कर सकते हैं।

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