जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन के खिलाफ कार्यवाही बंद

Oct 18, 2024 08:50 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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नोट - पहले यह खबर संक्षेप में जारी की गई थी। --- एक व्यक्ति ने

जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन के खिलाफ कार्यवाही बंद

एक व्यक्ति ने ईशा फाउंडेशन पर लगाया था दो बेटियों को बंधक बनाने का आरोप कोयंबटूर पुलिस ने रिपोर्ट में कहा- महिलाएं अपनी मर्जी से आश्रम में रह रही हैं

नयी दिल्ली, एजेंसी। उच्चतम न्यायालय ने ईशा फाउंडेशन के परिसर से दो लड़कियों को मुक्त कराने संबंधी याचिका पर कार्यवाही शुक्रवार को बंद कर दी। एक व्यक्ति ने कोयंबटूर में आध्यात्मिक नेता जग्गी वासुदेव के फाउंडेशन पर अपनी दो बेटियों को बंधक बनाने का आरोप लगाया था। उसने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में दोनों बेटियों को आश्रम से मुक्त कराने की गुहार लगाई थी।

शुक्रवार को सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि दोनों महिलाएं बालिग हैं। महिलाओं ने कहा है कि वे स्वेच्छा से तथा बिना किसी दबाव के आश्रम में रह रही हैं। पीठ ने यह भी कहा कि उसके तीन अक्तूबर के आदेश के अनुपालन में पुलिस ने उसके समक्ष स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत की है। पीठ में न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे।

पीठ ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से उत्पन्न इन कार्यवाहियों के दायरे का विस्तार करना अनावश्यक होगा। शुरू में याचिका मद्रास उच्च न्यायालय के समक्ष दायर की गई थी। शीर्ष अदालत ने तीन अक्टूबर को तमिलनाडु के कोयंबटूर में फाउंडेशन के आश्रम में दो महिलाओं को कथित तौर पर अवैध रूप से बंधक बनाकर रखने के मामले की पुलिस जांच पर प्रभावी रूप से रोक लगा दी थी।

उच्च न्यायालय के समक्ष दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को अपने पास स्थानांतरित करते हुए शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु पुलिस को निर्देश दिया था कि वह उच्च न्यायालय के उस निर्देश के अनुपालन में कोई और कार्रवाई न करे, जिसमें उसने पुलिस को इन महिलाओं को कथित रूप से अवैध तरीके से बंधक बनाकर रखने के मामले की जांच करने का भी निर्देश दिया था।

ईशा फाउंडेशन ने उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। ईशा फाउंडेशन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कोयंबटूर पुलिस को निर्देश दिया था कि वह फाउंडेशन के खिलाफ दर्ज सभी मामलों का विवरण एकत्र करे और आगे के विचार के लिए उन्हें अदालत के समक्ष पेश करे। सर्वोच्च न्यायालय ने इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किया।

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