बाल यौन तस्करी मामलों में पॉक्सो के तहत चलेगा मुकदमा : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यौन शोषण के लिए बच्चों की तस्करी के मामलों में पॉक्सो अधिनियम के तहत आरोप लगाए जा सकते हैं। पीड़ित की सहमति का कोई महत्व नहीं है। मानव तस्करी का अपराध साबित करने के लिए यह जरूरी नहीं है कि पीड़ित ने सहमति नहीं दी थी।

-पीड़ितों से जुड़े कानूनी ढांचे को स्पष्ट करते हुए निर्देश जारी किए नई दिल्ली, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यौन शोषण के लिए बच्चों की तस्करी के मामलों में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत आरोप लगाए जा सकते हैं।
न्यायालय के निर्देश
साथ ही भारतीय न्याय संहिता और अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम के प्रावधान भी लागू होंगे। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने शुक्रवार को यौन पीड़ितों के पुनर्वास से जुड़े कानूनी ढांचे को स्पष्ट करते हुए कई निर्देश जारी किए। पीठ ने कहा कि यदि किसी वयस्क पीड़ित के शोषण के लिए धमकी, बल प्रयोग, अपहरण, धोखाधड़ी, शक्ति का दुरुपयोग, कमजोर स्थिति का फायदा उठाना या किसी व्यक्ति की सहमति प्राप्त करने के लिए भुगतान अथवा लाभ देने-लेने जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया गया हो, तो पीड़ित की सहमति का कोई महत्व नहीं रह जाता। शीर्ष अदालत ने कहा कि मानव तस्करी के शिकार बच्चे की सहमति अप्रासंगिक है, चाहे ऐसे साधनों का उपयोग किया गया हो या नहीं। मानव तस्करी का अपराध साबित करने के लिए यह साबित करना जरूरी नहीं है कि पीड़ित ने सहमति नहीं दी थी।
शोषण और सहमति
पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में ध्यान पूरी तरह अपराधियों की गतिविधियों और मंशा पर होना चाहिए। यदि तस्करी का अपराध और उसमें दबाव, धोखे या अन्य अवैध साधनों के प्रयोग को साबित कर दिया जाता है, तो पीड़ित की कथित सहमति को कोई कानूनी महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि कोई व्यक्ति यह जानते हुए भी कि उसे देह व्यापार या वेश्यावृत्ति में धकेला जा रहा है वह तस्करी का शिकार हो सकता है, क्योंकि हो सकता है कि उसे काम की वास्तविक परिस्थितियों के बारे में धोखा दिया गया हो और बाद में वे परिस्थितियां शोषणकारी साबित हुई हों। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 23 मानव तस्करी और जबरन श्रम के सभी समान रूपों पर प्रतिबंध लगाता है। इसका दायरा व्यापक है और यह केवल राज्य के विरुद्ध ही नहीं, बल्कि ऐसे कार्यों में शामिल निजी व्यक्तियों पर भी लागू होता है।
नाबालिग की सहमति कानूनन अमान्य
पीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय कानून में यह निर्विवाद है कि किसी भी बच्चे से जुड़ा यौन शोषण कानून की नजर में असहमति पर आधारित माना जाता है। पॉक्सो अधिनियम के तहत बच्चों के खिलाफ यौन उत्पीड़न, गंभीर यौन हमले तथा बाल यौन शोषण सहित सभी प्रकार के यौन अपराध आते हैं। पीठ ने यह आदेश मानव तस्करी पर रोक लगाने और व्यावसायिक उद्देश्य से यौन शोषण के पीड़ितों के अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग करने वाली प्रज्वला नामक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया.
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