हर किसी को मंदिरों और मठों में जाने का होना चाहिए अधिकार : संविधान पीठ
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हर किसी को सभी मंदिरों और मठों में जाने का अधिकार होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में संविधान पीठ ने महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर भेदभाव के मामलों की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि किसी संप्रदाय द्वारा दूसरों को बाहर रखना हिंदू धर्म को नुकसान पहुंचा सकता है।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने गुरुवार को कहा कि हर किसी को सभी मंदिरों और मठों में जाने का अधिकार होना चाहिए। किसी एक खास संप्रदाय के मंदिरों से दूसरे संप्रदायों को बाहर रखने से हिंदू धर्म पर बुरा असर पड़ेगा और यह समाज को बांट देगा। देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अगुवाई वाली नौ जजों की संविधान पीठ ने केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। संविधान पीठ में सीजेआई सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची भी शामिल हैं।
सुनवाई के तीसरे दिन नायर सर्विस सोसाइटी, अयप्पा सेवा समाजम और क्षेत्र संरक्षण समिति जैसे संगठनों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने कहा कि ‘अनुच्छेद 26(बी) किसी संप्रदाय को यह तय करने का अधिकार देता है कि वह अपने संप्रदाय विशेष के मंदिरों में दूसरों को प्रवेश की अनुमति दे सकता है और उन्हें पूजा-पाठ में शामिल कर सकता है या फिर वह प्रवेश को केवल अपने संप्रदाय तक ही सीमित रख सकता है।’ उन्होंने यह भी कहा कि अनुच्छेद 26(बी) जो किसी धार्मिक संप्रदाय को अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है, अनुच्छेद 25(2)(बी) पर प्रभावी होगा, जो राज्य को धर्म के भीतर सुधार के लिए कानून बनाने या सभी सार्वजनिक हिंदू धार्मिक संस्थानों के द्वार खोलने की अनुमति देता है। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ‘एक आशंका है। यदि आप प्रवेश के अधिकार की बात करते हैं, खासकर वेंकटरमण देवरू मामले के संदर्भ में, जहां यह कहा गया था कि गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों के अलावा किसी और को प्रवेश नहीं मिलेगा, तो इसका हिंदू धर्म पर बुरा असर पड़ेगा।’ उन्होंने आगे कहा कि ‘हर किसी को हर मंदिर और मठ में जाने का अधिकार होना चाहिए। सबरीमाला फैसले से जुड़े विवाद को अभी एक तरफ रख दें। लेकिन अगर आप यह कहते हैं कि यह एक प्रथा है और धर्म का मामला है कि मैं दूसरों को बाहर रखूंगा और केवल मेरे ही वर्ग या संप्रदाय के लोग मंदिर में जाएंगे, कोई और नहीं, तो यह हिंदू धर्म के लिए अच्छा नहीं है। धर्म पर कोई बुरा असर नहीं पड़ना चाहिए। ऐसा करना उस संप्रदाय के लिए ही नुकसानदेह साबित होगा।’ जस्टिस नागरत्ना की इस टिप्पणी से सहमति जताते हुए जस्टिस कुमार ने कहा कि ‘इस तरह एक संप्रदाय द्वारा दूसरे संप्रदाय के लोगों को मंदिरों और मठों से बाहर करना समाज को बांट देगा।’इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता वैद्यनाथन ने संविधान पीठ से कहा कि ‘यह एक वास्तविकता है और इसके बारे में सोचना प्रत्येक संप्रदाय का काम है।’ इसके जवाब में जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ‘राज्य सभी वर्गों के लिए मंदिर तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत हस्तक्षेप कर सकता है।’ वहीं, जस्टिस कुमार ने भी वरिष्ठ अधिवक्ता वैद्यनाथन से कहा कि इसीलिए हमने कहा था कि इसे मुद्दे को बहुत ऊंचे स्तर पर न ले जाएं। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अनुच्छेद 25 को अनुच्छेद 17 के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जो अस्पृश्यता (छुआछूत) को प्रतिबंधित करता है। हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता वैद्यनाथन इस बात पर सहमत हुए कि सार्वजनिक मंदिर सभी के लिए खुले होने चाहिए, लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि सांप्रदायिक मंदिरों के लिए यही आग्रह नहीं किया जा सकता। इस के बाद सीजेआई सूर्यकांत ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ‘वरिष्ठ अधिवक्ता वैद्यनाथन के तर्क दो कारणों से टिक नहीं सकते, पहला यह सीधे तौर पर अनुच्छेद 25(2)(बी) की भाषा के विरुद्ध है और दूसरा यह मानते हुए भी कि अनुच्छेद 25(2)(बी) अनुच्छेद 26 को नियंत्रित नहीं करेगा, अनुच्छेद 26(बी ) स्वयं नैतिकता द्वारा शासित है, जिसमें अनुच्छेद 17 शामिल है।’ उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 17 नैतिकता का एक सिद्धांत है।देश के कई मंदिरों में पुरुषों के प्रवेश पर भी है प्रतिबंध : केंद्र :केंद्र सरकार ने गुरुवार को केरल के सबरीमाला में भगवान अयप्पा मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को सही ठहराया और कहा कि देश में ऐसे कई मंदिर हैं, जहां पुरुषों को प्रवेश की इजाजत नहीं है। संविधान पीठ के समक्ष केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 में पांच जजों की संविधान पीठ द्वारा 4:1 के बहुमत से पारित उस फैसले को गलत बताया, जिसमें सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं को भी प्रवेश की अनुमति दी गई थी। मेहता ने पीठ से कहा कि 2018 का फैसला पूरी तरह से इस धारणा पर आधारित है कि पुरुष श्रेष्ठ हैं और महिलाएं निचले पायदान पर हैं। तुषार मेहता ने संविधान पीठ से कहा कि उन्होंने एक लिखित दलील पेश की है और ऐसे उदाहरण दिए हैं जहां मंदिरों में पुरुषों को अनुमति नहीं है क्योंकि यह देवी भगवती का मंदिर है, इसलिए इससे कुछ खास धर्म और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि कुछ मंदिर ऐसे हैं जहां पुरुष पुजारियों को महिला भक्तों के पैर धोने का धार्मिक अधिकार है। केंद्र की ओर से लिखित दलील में कहा गया है कि राजस्थान के पुष्कर में स्थित भगवन ब्रह्मा का एक मंदिर है जो 14वीं सदी है, इसमें शादीशुदा पुरुषों के परिसर में आने पर रोक है। इसमें कहा गया है कि यह दुनिया का इकलौता ब्रह्मा मंदिर है। इसमें बिहार के मुजफ्फरपुर में मौजूद एक माता मंदिर का भी हवाला दिया है। इस माता मंदिर में एक खास समय के दौरान पुरुषों का जाना पूरी तरह से वर्जित है। इसमें कहा गया है कि यह नियम इतने सख्त हैं कि किसी पुरुष पुजारी को भी मंदिर के अंदर जाने की अनुमति नहीं हैं। उस खास समय के दौरान सिर्फ महिलाओं को ही मंदिर में प्रवेश की अनुमति होती है।इसी तरह केंद्र सरकार ने कन्याकुमारी में एक दुर्गा मंदिर का जिक्र किया है, जहां मां भगवती दुर्गा की पूजा होती है। मान्यता है कि मां भगवती तपस्या के लिए समुद्र के बीच एक सुनसान जगह पर गई थीं ताकि वे भगवान शिव को अपना पति बना सकें। सरकार ने कहा है कि पुराणों के अनुसार, एक सती की रीढ़ की हड्डी इस मंदिर पर गिरी थी और यहां स्थित देवी को सन्यास की देवी भी कहा जाता है। इन वजहों से सन्यासी पुरुषों को मंदिर के गेट तक जाने की अनुमति है, जबकि शादीशुदा पुरुषों का मंदिर के परिसर में भी आने पर रोक है। मेहता ने पीठ से कहा कि इसलिए यह पुरुष-केंद्रित या महिला-केंद्रित धार्मिक मान्यताओं का सवाल नहीं है। वर्तमान मामले में, यह संयोग से महिला-केंद्रित है।
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Prabhat Kumarप्रभात कुमार देश के प्रमुख कानूनी और संवैधानिक मामलों के अनुभवी पत्रकारों में से एक हैं, जो पिछले 16 वर्षों से हिन्दुस्तान के साथ जुड़े हैं। पत्रकारिता में 20+ वर्षों के अनुभव के साथ उन्होंने अदालत और कानून से जुड़े जटिल विषयों को आम पाठकों तक सरल और प्रभावी तरीके से पहुंचाने में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है।
अपने करियर की शुरुआत अदालत की रिपोर्टिंग से करने वाले प्रभात कुमार आज सुप्रीम कोर्ट, कानून मंत्रालय, भारतीय निर्वाचन आयोग, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, लोकपाल और राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों को कवर करते हैं।
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