सबरीमाला मंदिर: सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता- संविधान पीठ
प्रभात कुमार नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ ने बुधवार को

प्रभात कुमार नई दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ ने बुधवार को कहा कि सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता। संविधान पीठ ने यह भी कहा कि किसी भी अदालत के लिए लाखों लोगों की अस्था को गलत ठहराना मुश्किल है।देश के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न संप्रदायों के धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की है। प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर सहित केरल के लगभग 1,248 से अधिक मंदिरों का प्रबंधन कर रहे त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड की ओर वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने बहस के चौथे दिन अपने दलीलों की शुरुआत धार्मिक मामलों में जनहित याचिका की स्वीकार्यता के मुद्दे से की।
उन्होंने मामले में तय किए गए सातवें मुद्दे यानी कि ‘क्या अदालत किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर सकता है जो उस धर्म से संबंधित नहीं है, लेकिन उस धर्म की किसी धार्मिक प्रथा पर सवाल उठा रहा हो?’ वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने कहा कि इस तरह की जनहित याचिका पर सुनवाई करने के लिए अदालत को बहुत ऊंचा मानदंड अपनाना चाहिए। संविधान पीठ में सीजेआई सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्य बागची भी शामिल हैं।इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि ‘किसी अदालत के लिए सबसे मुश्किल काम शायद यह घोषणा करना हो सकता है कि लाखों लोगों की आस्था गलत या भ्रामक है।’ जस्टिस नागरत्ना ने भी इसी तरह की चिंताएं जाहिर की और कहा कि ऐसी जहनित याचिकाओं पर तब तक विचार नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि याचिकाकर्ता का उस मामले से कोई सीधा संबंध न हो। उन्होंने कहा कि ‘सामाजिक सुधार के नाम पर किसी भी धर्म के मूल स्वरूप को बदला नहीं जा सकता। साथ ही कहा कि सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर किसी भी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता।’ इससे पहले, वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने संविधान पीठ से कहा कि ‘जहां एक ओर अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत हिंदू धर्म के सभी संप्रदाय सार्वजनिक प्रकृति वाले किसी हिंदू धार्मिक संस्थान में प्रवेश की मांग कर सकते हैं, वहीं दूसरी ओर अनुच्छेद 26(बी) के तहत उस धार्मिक संप्रदाय को यह अधिकार होगा कि वह यह तय करे कि आंतरिक अनुष्ठान किस प्रकार किए जाने चाहिए। उन्होंने संविधान पीठ से अनुच्छेद 25(2)(बी) और अनुच्छेद 26(बी) की ऐसी व्याख्या किए जाने का आग्रह किया जो दोनों संवैधानिक प्रावधानों के बीच सामंजस्य स्थापित करती हो। उन्होंने सरदार सैयदना फैसले (जिसमें बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्स-कम्युनिकेशन एक्ट को रद्द कर दिया गया था) में की गई एक टिप्पणी का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 25(2)(बी) का उद्देश्य ‘किसी धर्म को सुधार के नाम पर पूरी तरह से समाप्त कर देना या उसकी पहचान मिटा देना’ नहीं था।’इस पर जस्टिस बागची ने वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी से जानना चाहा कि ‘क्या उनका तर्क यह है कि अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत बनाए गए किसी कानून द्वारा धर्म की ‘आवश्यक प्रथाओं’ को छुआ नहीं जाना चाहिए? जस्टिस बागची ने एक काल्पनिक सवाल भी पूछा कि ‘अगर कोई धार्मिक नेता मोक्ष पाने के तरीके के तौर पर सामूहिक आत्महत्या का उपदेश देता है और उसके अनुयायी अपनी जान देने की कोशिश कर रहे हैं, तो क्या अदालत को उस प्रथा पर सवाल उठाने वाले, उस संप्रदाय से बाहर के किसी व्यक्ति द्वारा दायर जनहित याचिका पर कार्रवाई नहीं कर सकता?’ इसके जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने कहा कि यह एक अति-गंभीर मामला है। उन्होंने कहा कि शायद असाधारण परिस्थितियों में ऐसे जनहित याचिका पर सुनवाई करना कोर्ट के लिए उचित हो सकता है। लेकिन सामान्य नियम यह होना चाहिए कि कोर्ट इसमें दखल न दे। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि 9 जजों की इस संविधान पीठ को इस मामले की पेचीदगियों को सुलझाना होगा, लेकिन ऐसा करते समय उन्हें आवश्यकता के सिद्धांत को इस मामले में हावी नहीं होने देना चाहिए। त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड की ओर से संविधान पीठ को बताया गया कि ‘आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के सिद्धांत’ का भी विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि संवैधानिक सुरक्षा केवल आवश्यक धार्मिक प्रथाओं तक ही सीमित नहीं रखी जा सकती, और यह तय करना अदालतों का काम नहीं है कि कोई धार्मिक प्रथा ‘आवश्यक’ है या नहीं।इस पर जस्टिस सुंदरेश ने सवाल किया कि अनुच्छेद 25(2)(बी) में ‘सामाजिक सुधार’ वाक्यांश का इस्तेमाल क्यों किया गया, जबकि अनुच्छेद 25 की शुरुआत में ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य’ शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इसके जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि ऐसा शायद कुछ ऐसी प्रथाओं से निपटने के लिए किया गया हो, जिन्हें किसी भी निष्पक्ष मापदंड पर सही नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने सुझाव दिया कि पर्सनल लॉ को रेगुलेट करने वाले कानूनों को अनुच्छेद 25(2)(बी) के अर्थ के दायरे में सामाजिक सुधार माना जा सकता है। इस पर सहमति जताते हुए जस्टिस सुंदरेश कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम सामाजिक सुधार का एक उदाहरण हो सकता है।वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने संविधान पीठ से कहा कि अनुच्छेद 25(2)(बी) को इस तरह से नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि उससे अनुच्छेद 25(1) के तहत गारंटीकृत धर्म की स्वतंत्रता के मूल अधिकार में कोई कमी आए। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 25(2) धर्म की स्वतंत्रता पर कोई सीमा नहीं है, जैसा कि अनुच्छेद 25(1) में उल्लिखित सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधारों के मामले में है।अदालत समुदाय की मान्यता को मानने के लिए बाध्य है - त्रावणकोर देवस्वम बोर्डत्रावणकोर देवस्वम बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पीठ से कहा कि ‘आप किसी खिलौने की दुकान से नहीं निपट रहे हैं। आप किसी रेस्टोरेंट से नहीं निपट रहे हैं। आप एक ऐसे देवता से निपट रहे हैं जो शाश्वत ब्रह्मचारी हैं, जो गृहस्थ आश्रम के सभी रूपों से दूर रहते हैं। इसलिए, यह तर्क दिया जा सकता है कि 11 साल क्यों नहीं, 49 साल क्यों नहीं। लेकिन यह माना जाता है कि इस आयु वर्ग की महिलाएं देवता के स्वरूप और पहचान के बिल्कुल विपरीत होंगी। लेकिन वे महिलाएं निश्चित रूप से भगवान अयप्पा के दर्शन कई अन्य मंदिरों में कर सकती हैं। अगर वे इतनी ही चिंतित हैं, तो वे इसी एक मंदिर में क्यों जाना चाहेंगी जो अपने स्वरूप में अद्वितीय है।’ संविधान पीठ को यह भी बताया गया कि किसी समुदाय की मान्यताओं और प्रथाओं का मूल्यांकन उस समुदाय की अपनी मान्यताओं के आधार पर किया जाना चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने कहा कि ‘अदालत समुदाय की मान्यता को स्वीकार करने के लिए बाध्य है, और उस मान्यता पर फैसला सुनाना अदालत का काम नहीं है।उन्होंने कह कि अनुच्छेद 25 में धर्म का पालन करने, उसे मानने और उसका प्रचार करने के अधिकार पर जो अनुमेय प्रतिबंध या अपवाद दिए गए हैं, वे विस्तृत और गहन विचार-विमर्श के बाद तय किए गए थे और इस अधिकार में कोई भी अन्य स्पष्ट या निहित ढील संविधान निर्माताओं द्वारा परिकल्पित नियंत्रण और संतुलन की नाजुक और जटिल प्रणाली को तोड़ देगी।’ पीठ के समक्ष यह भी तर्क दिया कि एक ही धर्म या संप्रदाय के लोगों के बीच, उनके संस्थानों में नियुक्तियों के मामले में भेदभाव नहीं किया जा सकता।संवैधानिक नैतिकता के आधार पर कानून को रद्द नहीं किया जा सकता- जस्टिस नागरत्नरसंवैधानिक नैतिकता के मुद्दे हुई बहस पर दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि ‘कानून को संवैधानिक नैतिकता के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता। इसे संविधान के भाग 3 का उल्लंघन करने के आधार पर या विधायी अक्षमता के आधार पर रद्द किया जा सकता है।’ वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता जैसा कोई भी सिद्धांत एक बाहरी मानक लेकर आता है, जिसे संभालना बहुत खतरनाक हो जाता है। सीजेआई सूर्यकांन टिप्पणी की कि संवैधानिक नैतिकता का खतरा इसे आंकने के उन मानकों से है, जिन्हें संभाला नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि इसके लिए पूरी तरह से व्यक्तिपरकता और व्यक्तिगत राय की जरूरत होती है।इस पर सिंघवी ने कहा कि ‘यह एक बेकाबू घोड़ा है... एक डायनासोर है, जिस पर मेरे लॉर्ड्स (जजों) सवारी नहीं कर सकते।’ जस्टिस अमनुल्लाह ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता की व्याख्या अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग तरीके से क्यों नहीं की जानी चाहिए।
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