‘सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं कर सकते’
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने कहा कि आस्था को गलत ठहराना मुश्किल है। साक्ष्य में यह भी कहा गया कि सामाजिक कल्याण के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता। इस मामले में महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध को लेकर सुनवाई हो रही है।

सबरीमाला मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा ‘किसी भी अदालत के लिए आस्था को गलत ठहराना मुश्किल’प्रभात कुमारनई दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट के 9 जज की संविधान पीठ ने बुधवार को कहा कि सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता। संविधान पीठ ने यह भी कहा कि किसी भी अदालत के लिए लाखों लोगों की आस्था को गलत ठहराना मुश्किल है।देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न संप्रदायों के धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की।
प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर का प्रबंधन कर रहे त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) की ओर वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने बहस के चौथे दिन धार्मिक मामलों में जनहित याचिका की स्वीकार्यता के मुद्दे को उठाया। उन्होंने अपनी दलील में कहा कि क्या अदालत किसी ऐसे व्यक्ति की जनहित याचिका पर सुनवाई कर सकता है जो उस धर्म से संबंधित नहीं है, लेकिन उस धर्म की किसी धार्मिक प्रथा पर सवाल उठा रहा हो? इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि किसी अदालत के लिए सबसे मुश्किल काम शायद यह घोषणा करना हो सकता है कि लाखों लोगों की आस्था गलत या भ्रामक है। जस्टिस नागरत्ना ने भी इसी तरह की चिंताएं जाहिर की और कहा कि ऐसी जहनित याचिकाओं पर तब तक विचार नहीं करना चाहिए, जब तक कि याचिकाकर्ता का उस मामले से कोई सीधा संबंध न हो। उन्होंने कहा कि ‘सामाजिक सुधार के नाम पर किसी भी धर्म के मूल स्वरूप को बदला नहीं जा सकता। संविधान पीठ में सीजेआई सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्य बागची भी शामिल हैं।अदालत तय नहीं कर सकती धार्मिक प्रथा जरूरी है या नहींवरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि 9 जजों की इस संविधान पीठ को इस मामले की पेचीदगियों को सुलझाना होगा, लेकिन ऐसा करते समय उन्हें आवश्यकता के सिद्धांत को इस मामले में हावी नहीं होने देना चाहिए। त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) की ओर से संविधान पीठ को तर्क दिया कि संवैधानिक सुरक्षा केवल जरूरी धार्मिक प्रथाओं तक ही सीमित नहीं रख सकते, और यह तय करना अदालतों का काम नहीं है कि कोई धार्मिक प्रथा ‘जरूरी’ है या नहीं।अनुच्छेद में ‘सामाजिक सुधार’ शब्द का इस्तेमाल क्यों?जस्टिस सुंदरेश ने सवाल किया कि अनुच्छेद 25(2)(बी) में ‘सामाजिक सुधार’ वाक्यांश का इस्तेमाल क्यों किया गया, जबकि अनुच्छेद 25 की शुरुआत में ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य’ शब्दों का इस्तेमाल किया गया। इसके जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि ऐसा शायद कुछ ऐसी प्रथाओं से निपटने के लिए किया गया हो, जिन्हें किसी भी निष्पक्ष मापदंड पर सही नहीं ठहराया जा सकता।‘मामला शाश्वत ब्रह्मचारी देवता का है’त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पीठ से कहा कि आप किसी ‘खिलौने की दुकान’ या किसी रेस्टोरेंट से नहीं निपट रहे हैं। आप एक ऐसे देवता से निपट रहे हैं जो शाश्वत ब्रह्मचारी हैं, जो गृहस्थ आश्रम के सभी रूपों से दूर रहते हैं। इसलिए, यह तर्क दिया जा सकता है कि 11 साल क्यों नहीं, 49 साल क्यों नहीं। यह माना जाता है कि इस आयु वर्ग की महिलाएं देवता के स्वरूप और पहचान के बिल्कुल विपरीत होंगी। वे महिलाएं निश्चित रूप से भगवान अयप्पा के दर्शन कई अन्य मंदिरों में कर सकती हैं। अगर वे इतनी ही चिंतित हैं, तो वे इसी एक मंदिर में क्यों जाना चाहेंगी जो उनके विपरीत है। सिंघवी ने यह भी कहा कि यह मामला लैंगिक भेदभाव भी नहीं है।कोर्ट समुदाय की मान्यता को मानने को बाध्य : टीडीबीवरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने कहा कि संविधान पीठ को यह भी बताया गया कि किसी समुदाय की मान्यताओं और प्रथाओं का मूल्यांकन उस समुदाय की अपनी मान्यताओं के आधार पर करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालत समुदाय की मान्यता स्वीकार करने के लिए बाध्य है, और उस मान्यता पर फैसला सुनाना अदालत का काम नहीं है।संवैधानिक नैतिकता के आधार पर कानून रद्द नहीं कर सकते : जस्टिस नागरत्नाजस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि कानून को संवैधानिक नैतिकता के आधार पर रद्द नहीं कर सकते। इसे संविधान के भाग-3 का उल्लंघन करने के आधार पर या विधायी अक्षमता के आधार पर रद्द कर सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता जैसा कोई भी सिद्धांत एक बाहरी मानक लेकर आता है, जिसे संभालना बहुत खतरनाक हो जाता है।संवैधानिक नैतिकता के खतरे को संभाला नहीं जा सकता : सीजेआईसीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि संवैधानिक नैतिकता का खतरा इसे आंकने के उन मानकों से है, जिन्हें संभाला नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि इसके लिए पूरी तरह से व्यक्तिपरकता और व्यक्तिगत राय की जरूरत होती है। इस पर सिंघवी ने कहा कि यह एक बेकाबू घोड़ा है, एक डायनासोर है, जिस पर मेरे लॉर्ड्स (जजों) सवारी नहीं कर सकते। जस्टिस अमनुल्लाह ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता की व्याख्या अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग तरीके से क्यों नहीं की जानी चाहिए।
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