विश्लेषण : सियासी और सत्ता समीकरण से सरताज बने सम्राट
बिहार में भाजपा के नेता सम्राट चौधरी बुधवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। वह भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बनेंगे। सम्राट ने 2018 में भाजपा जॉइन की और तेजी से सफलता की सीढ़ी चढ़ते गए। नीतीश कुमार ने सम्राट को अपना उत्तराधिकारी मानते हुए उनका समर्थन किया। उनकी आक्रामक राजनीति ने भाजपा को मजबूत किया।

विनोद बंधु पटना। बिहार में भाजपा के तेज-तर्रार नेता सम्राट चौघरी बुधवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। बिहार में भाजपा का पहला मुख्यमंत्री बनने का गौरव भी उन्हें हासिल होगा। सम्राट चौधरी महज आठ साल पहले 2018 में भाजपा में शामिल हुए थे। उन्होंने भाजपा में आने के बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए। उनकी आक्रामक शैली भाजपा को खूब रास आई। उनके इसी अंदाज से उत्साहित देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तीन साल पहले रोहतास की एक सभा में कहा था कि बिहार में भाजपा को अपना सम्राट मिल गया। उस समय भाजपा विपक्ष में थी और सम्राट पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे।बिहार
में सम्राट की ताजपोशी की राह समीकरण की सियासत और परस्पर सहयोग की संरचना ने आसान की। नीतीश कुमार ने अपनी समृद्धि यात्रा के दौरान जमुई की सभा में सम्राट के कंधे पर हाथ रखते हुए ऐलान कर दिया था कि आगे अब यही सब काम करेंगे। उसी समय से सम्राट की दावेदारी सबसे मजबूत मानी जाने लगी। हालांकि, इसके बाद उनके नाम पर कई किंतु-परंतु के साथ कयासों का दौर चला। करीब डेढ़ दर्जन नेताओं के नाम अलग-अलग समय में अलग-अलग तर्कों के साथ चर्चा में आए, लेकिन ऐसे नाम ज्यादा देर तक टिके नहीं और नए नाम सामने आ गए। दो नाम शुरू से अंत तक संभावना के केंद्र बने रहे। उनमें सम्राट चौधरी और नित्यानंद राय शामिल हैं।नित्यानंद राय भाजपा के पुराने, समर्पित और जुझारू नेता रहे हैं। पार्टी को आगे ले जाने में उनका बड़ा योगदान रहा है। कभी कोई विवाद उनके साथ नहीं जुड़ा, लेकिन जातीय और सत्ता समीकरण दोनों सम्राट चौधरी के अनुकूल रहे। नीतीश कुमार ने बिहार में लव-कुश समीकरण को हमेशा अपना आधार बनाए रखा और सोशल इंजीनियरिंग और सरकार के फैसलों से अति पिछड़ा समाज को जोड़कर सत्ता की मजबूत इमारत खड़ी की। इसी वजह से बीते दो दशक से वह बिहार की सत्ता के केंद्र रहे। उन्होंने जब चाहा भाजपा और राजद-कांग्रेस को सत्ता से जोड़ा और बाहर किया। खुद सरकार का नेतृत्व करते रहे। नीतीश कुमार ने सम्राट का नाम आगे कर एक तरह से अपने परंपरागत समीकरण की सहयोगी जाति के प्रति उधार चुकता किया है। साथ ही जद(यू) के भविष्य की राजनीति की जड़ें भी सींची हैं। उनके पुत्र निशांत कुमार जद(यू) को मजबूती देने के संकल्प के साथ पार्टी में शामिल हो चुके हैं। उन्हें नीतीश कुमार की इस पहल से आगे ताकत मिलेगी।सम्राट चौधरी राजद, जद(यू) और हम में भी रहे हैं लेकिन जबसे भाजपा में आए, उन्होंने राजद के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाए। सदन से सड़क तक उन्होंने राजद शासनकाल पर तीखे प्रहार किए। लालू, राबड़ी और तेजस्वी पर बेबाक प्रहार से पार्टी में उनकी अलग पहचान बनी। विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद उन्होंने दो महत्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने कहा कि मैं तीन दशक से राजनीति में सक्रिय हूं, लेकिन भाजपा में आने से पहले मेरी कोई विचारधारा नहीं बनी। दूसरा, नीतीश कुमार ने मुझे सिखाया कि सुशासन कैसे कायम किया जाता है। सम्राट चौधरी जब प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष बने तो उन्होंने इस संकल्प के साथ सिर पर पगड़ी बांधी थी कि नीतीश कुमार को सत्ता से बाहर करके छोड़ेंगे। खुद नीतीश कुमार ने विधान परिषद में जब उनसे एक बार पगड़ी के बारे में पूछा तो उनका बेबाक जवाब था कि आपको गद्दी से हटाने के लिए बांधी है। आज नीतीश कुमार ही उनके सबसे बड़े पैरोकार बने। यही सम्राट चौधरी की खासियत है। वह जहां भी रहते हैं, विश्वास का रिश्ता बनाते हैं और इसी में उनकी तरक्की का राज छिपा है। कहते हैं वह दोस्तों के दोस्त हैं।
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