कानूनी खामियां नकली दवा के रैकेट को खत्म करने में बाधा

Prabhat Kumar हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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कोरोना महामारी के बाद भारत में नकली दवाओं का कारोबार तेजी से बढ़ा है। यह कारोबार अब 25 प्रतिशत तक पहुंच गया है। औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम में कमियों और संसाधनों की कमी ने नकली दवाओं के रैकेट को खत्म करने में बाधा डाली है। एनएचआरसी ने इसके खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया है।

कानूनी खामियां नकली दवा के रैकेट को खत्म करने में बाधा

नई दिल्ली। पिछले कुछ सालों, खासकर कोरोना महामारी के बाद से देश में नकली दवाओं का कारोबार तेजी से बढ़ा है। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि देश में नकली दवाओं का कारोबार 25 फीसदी तक पहुंच गया है। लेकिन, औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम में व्याप्त कुछ कमियां और संसाधनों की कमी नकली दवा के कारोबारियों पर नकेल कसने और इसके अंतरराज्यीय रैकेट को खत्म करने में आड़े आ रही हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) में देश में नकली दवाओं लगाम लगाने के लिए हुई एक चर्चा में भारतीय औषधि महानियंत्रक (डीजीसीआई) ने खुद इस बात को स्वीकार किया कि कानून में व्याप्त कुछ कमियां नकली दवा के कारोबारियों के रैकेट को खत्म करने में बाधा बनी हुई है।

एनएचआरसी में हाल ही हुई इस चर्चा में भारतीय औषधि महानियंत्रक (डीजीसीआई) के संयुक्त औषधि नियंत्रक चंद्रशेखर रंगा ने नकली दवाओं के मामलों से निपटने में औषधि निरीक्षकों (ड्रग्स इंस्पेक्टर) के सामने आने वाली कई चुनौतियों का जिक्र किया। उन्होंन कहा कि कानून में ड्रग्स इंस्पेक्टर को ऐसी शक्तियां नहीं दी हैं, जिससे वे अंतरराज्यीय रैकेट को खत्म कर सके। संयुक्त औषधि नियंत्रक रंगा ने कहा कि ‘यद्यपि औषधि निरीक्षक को औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 22 के तहत तलाशी और जब्ती अभियान चलाने के लिए शक्तियां प्राप्त हैं, लेकिन उनके पास आरोपी को समन जारी करने की शक्तियां नहीं हैं और वे स्वतंत्र रूप से अंतरराज्यीय नेटवर्क का पीछा करने में भी असमर्थ हैं।’ मानवाधिकार आयोग को उन्होंने बताया कि नकली दवा के मामले में आरोपियों के असहयोग और ड्रग्स इंस्पेक्टर के पास प्रवर्तन शक्तियों के अभाव के कारण जांच अक्सर रुक जाती है। उन्होंने नकली दवा के कारोबार पर लगाम लगाने में बुनियादी ढांचे की कमी को भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। बुनियादी ढांचे की कमी को गिनाते हुए उन्होंने कहा कि वाहनों की कमी, जब्त किए गए नकली दवाओं/सामान के लिए भंडारण सुविधाओं का अभाव होने के साथ कई राज्यों में प्रयोगशाला क्षमता की अपर्याप्तता और नकली दवाओं के मामलों की जांच के लिए समर्पित अधिकारियों की भी भारी कमी है।संस्थागत कार्रवाई की जरूरत :इस चर्चा में एनएचआरसी के महासचिव भरत लाल ने कहा था कि नकली और घटिया दोनों तरह की दवाएं जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार पर बुरा असर डालती हैं, इसलिए इस खतरे से निपटने के लिए मिलकर संस्थागत कार्रवाई करने की जरूरत है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मरीज दवाओं का सेवन सरकार के इस दायित्व पर भरोसा करते हुए करते हैं कि वह उनके जीवन और गरिमा की रक्षा करेगी। उन्होंने दवाओं पर हुए राष्ट्रीय सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा कि सरकार द्वारा लिए गए दवा के लगभग 10 फीसदी नमूनों में घटिया गुणवत्ता सामने आई है। एनएचआरसी महासचिव ने अक्तूबर 2025 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सरकारों के साथ-साथ ही केंद्रीय स्वास्थ्य और नियामक प्राधिकरणों को भेजे गए हाल के एक नोटिस का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि मीडिया में आई उन रिपोर्टों पर सरकारों को नोटिस भेजकर जवाब मांगा गया कि दूषित कफ सिरप पीने से कुछ बच्चों की कथित तौर पर मौत हो गई थी।कर्मचारियों की कमी :सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन में कुल इंस्पेक्टर के 419 स्वीकृत पद हैं। इनमें से करीब 230 खाली है। हाल की सूचनाओं के अनुसार, 22 से 49 असिस्टेंट ड्रग्स कंट्रोलर और इंस्पेक्टर पदों के लिए सक्रिय भर्ती चल रही है। अकेले दिल्ली में ड्रग्स इंस्पेक्टर के 25 पद खाली है।आंकड़े :-एसोचैम की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में घरेलू दवा बाजार में लगभग 25 फीसदी दवाएं या तो नकली हैं या घटिया गुणवत्ता की हैं।-कारोबार : नकली दवाओं का कारोबार लगभग ₹15,000 करोड़ सालाना से अधिक बताया गया है। इसमें हर साल 20 से 25 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है।-हॅाटस्पॉट : उत्तर भारत के क्षेत्र जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद आदि में इनका उत्पादन और वितरण अधिक सक्रिय है।

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प्रभात कुमार देश के प्रमुख कानूनी और संवैधानिक मामलों के अनुभवी पत्रकारों में से एक हैं, जो पिछले 16 वर्षों से हिन्दुस्तान के साथ जुड़े हैं। पत्रकारिता में 20+ वर्षों के अनुभव के साथ उन्होंने अदालत और कानून से जुड़े जटिल विषयों को आम पाठकों तक सरल और प्रभावी तरीके से पहुंचाने में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है।

अपने करियर की शुरुआत अदालत की रिपोर्टिंग से करने वाले प्रभात कुमार आज सुप्रीम कोर्ट, कानून मंत्रालय, भारतीय निर्वाचन आयोग, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, लोकपाल और राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों को कवर करते हैं।

उनकी रिपोर्टिंग न केवल तथ्यपरक होती है, बल्कि वह जनहित और संवैधानिक मूल्यों को केंद्र में रखकर जटिल कानूनी मुद्दों को सहज भाषा में प्रस्तुत करती है।

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