
गणतंत्र दिवस विशेष: संविधान की रोशनी में नागरिक भी समझें अपने अधिकार और कर्तव्य
गणतंत्र दिवस पर भारत ने संविधान के माध्यम से लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की। यह दिन नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को समझने का अवसर है। विशेषज्ञों ने नागरिकों को आवश्यक कानूनों और नियमों की जानकारी दी है, ताकि वे अपने अधिकारों को समझें और जिम्मेदार नागरिक बन सकें।
गणतंत्र दिवस वह अवसर है जब भारत ने स्वयं को संविधान के माध्यम से एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया। यह दिन न केवल राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है, बल्कि नागरिकों के अधिकारों, कर्तव्यों और कानून के महत्व को समझने का भी अवसर देता है। इसी भावना के साथ इस गणतंत्र दिवस पर हमने नागरिकों के लिए जरूरी नियमों और कानूनों को बताने की पहल की है। देश में अनेक ऐसे कानून हैं जो आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं। हालांकि, जानकारी के अभाव में लोग न केवल अपने अधिकारों से वंचित रह जाते हैं, बल्कि कई बार नियमों की अनजाने में अवहेलना कर बैठते हैं।
कानून का उल्लंघन होने पर दंड का प्रावधान है, लेकिन दंड की जानकारी न होने के कारण भी नागरिक ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिनसे उन्हें कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। संविधान के लागू होने की वर्षगांठ पर हमने विशेषज्ञों से बातचीत कर उन महत्वपूर्ण नियमों को अलग-अलग सेगमेंट में प्रस्तुत किया है, जो हर नागरिक के दैनिक जीवन से जुड़े हैं। इन सेगमेंट्स में अधिकारों के साथ-साथ यह भी बताया गया है कि नियमों के उल्लंघन पर क्या दंड हो सकता है। इस विशेष प्रस्तुति का उद्देश्य नागरिकों को जागरूक करना है, ताकि वे अपने अधिकारों को समझें, कानून का सम्मान करें और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में राष्ट्र निर्माण में सहभागी बन सकें। टैक्स नोटिस अगर गलत हो तो अपील के जनअधिकार का करें इस्तेमाल स्वतंत्र भारत के शुरूआती दौर से ही देश में व्यापार को बढ़ावा देने के लिए सरकार के स्तर पर बड़े प्रयास किए गए हैं। बदलते परिवेश में जैसे-जैसे व्यापार में कर निर्धारण के लिए नीतियों में बदलाव हुआ है, वैसे-वैसे व्यापारियों के अधिकार भी बढ़े हैं। टैक्स विशेषज्ञ व सीए नितिन बंसल का कहना है कि सरकार नीतियों में जो बदलाव करती है, वो एक विशेषज्ञ के तौर पर चार्टर्ड अकाउंटेंट और टैक्स अधिवक्ताओं की जानकारी में तो होती हैं, लेकिन अधिकांश व्यापारियों को इसकी जानकारी नहीं होती। उनका कहना है कि कई बार आयकर या जीएसटी विभाग की ओर से गलत नोटिस व्यापारियों को भेज दिए जाते हैं, वास्तव में व्यापारियों की कोई गलती नहीं होती। ऐसे मामलों में व्यापारियों को एक निर्धारित अवधि में नोटिस के खिलाफ अपील करने का अधिकार दिया गया है। आयकर विभाग हो या जीएसटी दोनों के ही नोटिस के खिलाफ अपील करके व्यापारी अपना पक्ष रख सकते हैं। सीए नितिन बंसल का कहना है कि नई नीतियों की जानकारी पाना व्यापारियों का अधिकार है। सरकार के स्तर पर भी कर प्रणाली में जो संशोधन किए जाते हैं, उसकी जानकारी व्यापारी वर्ग तक पहुंचाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। व्यापारी वर्ग सरकार से इसकी मांग कर सकते हैं। ---- गणतंत्र दिवस पर उत्साह में न भूलें कानून, वरना पड़ सकती है मुश्किल नई दिल्ली, कार्यालय संवाददाता। गणतंत्र दिवस देश के हर नागरिक के लिए गर्व और उत्साह का पर्व है। तिरंगा फहराना, राष्ट्रगान सुनना और संविधान के मूल्यों को याद करना इस दिन की पहचान है। लेकिन कई बार अधूरी या गलत जानकारी के चलते लोग अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जो उन्हें कानूनी परेशानी में डाल सकती हैं। राष्ट्रीय ध्वज के इस्तेमाल से लेकर राष्ट्रगान के सम्मान और नारेबाजी तक कई ऐसे नियम हैं, जिनकी जानकारी आम लोगों को नहीं होती। इन्हीं को लेकर लोगों के मन में उठने वाले आम सवालों पर वरिष्ठ अधिवक्ता अतुल जैन और अदिति दराल ने कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। किसी भी व्यक्ति द्वारा अपने घर, छत या गाड़ी पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने को लेकर नियम के बारे में वरिष्ठ अधिवक्ता अतुल जैन का कहना है कि गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर भारत का प्रत्येक नागरिक भारतीय ध्वज संहिता, 2002 के भाग-II के तहत अपने घर या छत पर राष्ट्रीय ध्वज फहरा सकता है, बशर्ते तिरंगे की गरिमा, मर्यादा और सम्मान का पूर्ण पालन किया जाए। हालांकि, निजी वाहनों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराना सामान्य नागरिकों के लिए कानूनी रूप से अनुमान्य नहीं है। वाहन पर तिरंगे का प्रयोग केवल निर्धारित संवैधानिक और सरकारी पदाधिकारियों तक सीमित है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय ध्वज को कपड़ों, दुपट्टे, मास्क या जूतों पर छापना या इस तरह इस्तेमाल करना, जिससे ध्वज का अपमान हो, राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 और राष्ट्रीय ध्वज संहिता के तहत निषिद्ध है। ऐसा कृत्य कानूनन दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। राष्ट्रगान का रीमिक्स, पैरोडी या बैकग्राउंड म्यूजिक के रूप में इस्तेमाल करने के बारे में वरिष्ठ अधिवक्ता अदिति दराल बताती हैं कि भारतीय राष्ट्रगान देश के सम्मान और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। इसके प्रयोग को राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 तथा केंद्र सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के तहत नियंत्रित किया गया है। राष्ट्रगान का रीमिक्स, पैरोडी या बैकग्राउंड संगीत के रूप में उपयोग करना अनुचित और कानूनन प्रतिबंधित है। राष्ट्रगान को किसी भी रूप में बदलना, विकृत करना या मनोरंजन अथवा मजाक के तौर पर प्रस्तुत करना उसकी गरिमा का अपमान माना जाता है और दंडनीय हो सकता है। क्या ‘संविधान बदलो’ या ‘संविधान बचाओ’ जैसे नारे गैरकानूनी हैं? इस सवाल के जवाब में अधिवक्ताओं का कहना है कि ‘संविधान बदलो’ या ‘संविधान बचाओ’ जैसे नारे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आते हैं। जब तक ऐसे नारे हिंसा, विद्रोह या संविधान के प्रति अपमान को बढ़ावा नहीं देते, तब तक उन्हें अपने-आप में गैरकानूनी नहीं माना जा सकता। ----------- ऐतिहासिक धरोहरों का नुकसान बन सकता है कानूनी जुर्म गणतंत्र दिवस के अवसर पर जब देश संविधान और राष्ट्रीय धरोहरों के संरक्षण की बात करता है, तब यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या हम अपनी ऐतिहासिक विरासत के प्रति अपने कर्तव्यों को लेकर सचमुच जागरूक हैं? आए दिन किले, स्मारक और ऐतिहासिक स्थलों पर नाम लिखने, दीवारों पर चढ़कर रील बनाने, या प्रतिबंधित क्षेत्रों में वीडियो शूट करने के मामले सामने आते हैं। ज्यादातर लोग इसे मस्ती या अनजाने में हुई गलती मानते हैं, लेकिन कानून की नजर में यह गंभीर अपराध है। कानून के जानकर और दिल्ली हाईकोर्ट के वकील एडवोकेट प्रणब घबरू के मुताबिक, ऐतिहासिक धरोहरों को नुकसान पहुंचाना केवल नैतिक भूल नहीं, बल्कि दंडनीय अपराध है। वे बताते हैं कि प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत संरक्षित स्मारकों की दीवारों पर लिखना, खुदाई करना, तोड़-फोड़ करना या तय सीमा के भीतर निर्माण अथवा गतिविधि करना अपराध की श्रेणी में आता है। बहुत से मामलों में लोगों को लगता है कि जुर्माना देकर छूट मिल जाएगी, जबकि कुछ स्थितियों में तीन साल तक की जेल का प्रावधान भी है। हाल के वर्षों में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने समस्या को और गंभीर बनाया है। युवा वर्ग ऐतिहासिक स्थलों को बैकड्रॉप की तरह इस्तेमाल कर रील्स बनाता है। कभी दीवारों पर चढ़कर, कभी प्रतिबंधित हिस्सों में जाकर। विशेषज्ञों का कहना है कि सुरक्षा घेरे तोड़ना, ड्रोन उड़ाना या फ्लैश लाइट का इस्तेमाल भी नियमों का उल्लंघन है। प्रणब घबरू कहते हैं कि अनजाने में किया गया नुकसान भी अपराध ही माना जाएगा, क्योंकि कानून में ‘इरादा’ से ज्यादा ‘कृत्य’ को महत्व दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 49 में राज्य को सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा का दायित्व सौंपा गया है, वहीं अनुच्छेद 51ए (एफ) हर नागरिक को देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करने का कर्तव्य याद दिलाता है। बावजूद इसके, जागरूकता की कमी के कारण लोग नियमों को हल्के में लेते हैं। पर्यटन स्थलों पर चेतावनी बोर्ड लगे होने के बावजूद उनका पालन नहीं होता। ---- फीस न देने पर छात्र का सर्टिफिकेट नहीं रोक सकते स्कूल गणतंत्र दिवस के अवसर पर संविधान से मिले नागरिक अधिकारों को समझना जितना जरूरी है, उतना ही आवश्यक है शिक्षा से जुड़े कानूनों की जानकारी होना। सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई ऐसे नियमों पर रोशनी डाली है, जिनसे आम छात्र और अभिभावक अक्सर अनजान रहते हैं। अशोक अग्रवाल के अनुसार, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 केवल सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं है। यह निजी स्कूलों पर भी लागू होता है और इसके तहत निजी अनएडेड स्कूलों को पहली कक्षा में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि फीस न देने की स्थिति में स्कूल या कॉलेज किसी भी छात्र का ट्रांसफर सर्टिफिकेट, माइग्रेशन या मार्कशीट नहीं रोक सकते। यूजीसी और शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार यह पूरी तरह गैर-कानूनी है और फीस विवाद का समाधान अलग प्रक्रिया से किया जाना चाहिए। रैगिंग को लेकर उन्होंने कहा कि यह अपराध केवल हॉस्टल तक सीमित नहीं है। कक्षा, कैंटीन, कॉलेज बस, परिसर और सोशल मीडिया पर की गई रैगिंग भी दंडनीय है, जिसमें निलंबन, निष्कासन और आपराधिक कार्रवाई तक का प्रावधान है। अशोक अग्रवाल ने बताया कि यौन उत्पीड़न से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2013 के तहत हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में आंतरिक शिकायत समिति का गठन अनिवार्य है, जो छात्राओं पर भी लागू होती है। वहीं दिव्यांग छात्रों को परीक्षा में विशेष सुविधा देना दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत कानूनी बाध्यता है। उन्होंने यह भी कहा कि कॉलेज मनमाने ढंग से फीस नहीं बढ़ा सकते और स्कूल बच्चों को किसी तय दुकान से किताबें या यूनिफॉर्म खरीदने को बाध्य नहीं कर सकते। साथ ही, सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों से आरटीआई के तहत जानकारी भी मांगी जा सकती है।

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