
संपादित--कच्चे दूध का सेवन इंसानों के लिए हो सकता है घातक
नंबर गेम 14 से 16 फीसदी पशुओं में होता है ब्रूसेला संक्रमण 0.9 फीसदी लोग
नई दिल्ली, प्रमुख संवाददाता। कच्चे दूध का सेवन इंसानों के लिए घातक हो सकता है। असल में पशुओं के माध्यम से फैलने वाले विभिन्न बैक्टीरिया के संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। इसमें सबसे अहम ब्रूसेला का संक्रमण है। दुधारू पालतु पशुओं के माध्यम से इसका संक्रमण इंसानों में फैलता है। कच्चे दूध का सेवन ब्रूसेला के संक्रमण का सबसे बड़ा कारण है। एम्स में स्वास्थ्य जागरूकता सप्ताह के मद्देनजर आयोजित एक कार्यक्रम में डॉक्टरों ने बताया कि इंसानों का स्वास्थ्य पर्यावरण के साथ-साथ पशुओं से भी जुड़ा हुआ है। पशुओं के माध्यम से फैलने वाली बीमारियां बढ़ भी रही है।

ऐसे में लोगों को सेहतमंद रखने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र को ठीक रखना जरूरी है। एम्स के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. विक्रम सैनी ने बताया कि स्क्रब टाइफस, ब्रूसेला संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। स्क्रब टाइफस का संक्रमण चूहों के माध्यम से फैलता है। दिल्ली-एनसीआर में भी इसके मामले बढ़े हैं। वहीं, ब्रूसेला संक्रमण का माध्यम दुधारू पशु बनते हैं। ऐसे में दूध को उबालकर ही पीना चाहिए। मवेशियों में होता है संक्रमण विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, 14 से 16 प्रतिशत दुधारू मवेशियों में ब्रूसेला का संक्रमण होता है। इस बैक्टीरिया के संक्रमण से मवेशियों के बीमार होने पर उनके माध्यम से संक्रमण लोगों में फैलता है। मवेशी खाना-पीना कम कर दे, सुस्त व दूध कम हो जाए तो सतर्क हो जाना चाहिए। यह मवेशी में ब्रूसेला के संक्रमण का संकेत हो सकता है। इंसानों में इस बीमारी का प्रसार विभिन्न राज्यों में 0.8 से 26.6 प्रतिशत के बीच है। सबसे अधिक पंजाब में 26.6 प्रतिशत मामले आते हैं। दिल्ली में 0.9 प्रतिशत मामले आते हैं। डॉ. विक्रम सैनी ने बताया कि कई लोग कच्चा दूध पीते हैं। उनमें गलत धारणा है कि कच्चा दूध पीना सेहत के लिए अच्छा होता है। कच्चे दूध के माध्यम से ब्रूसेला का 50 प्रतिशत संक्रमण इंसानों में होता है। इसलिए कच्चा दूध नहीं पीना चाहिए। पॉलिथिन का दूध पाश्चुरीकृत होता है। इसलिए उससे ब्रूसेला का खतरा नहीं होता। इनफर्टिलिटी का भी बन सकता है कारण ब्रूसेला संक्रमण होने पर बुखार व घुटनों में दर्द होता है। ज्यादातर जगहों पर इसकी जांच नहीं होती। इस वजह से ज्यादातर मामलों में बीमारी की पहचान नहीं हो पाती। यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती है। महिलाओं में गर्भपात व पुरुषों में इनफर्टिलिटी की समस्या हो सकती है। इससे बचाव के लिए संक्रमित मवेशियों की जल्दी जांच जरूरी होती है।

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